बालिग दंपति को साथ रहने की स्वतंत्रता, हाईकोर्ट ने कहा- हस्तक्षेप का किसी को अधिकार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है और ऐसे मामलों में धमकी या उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने पुलिस को सुरक्षा देने का भी निर्देश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बालिग विवाहित जोड़े को राहत देते हुए कहा है कि उन्हें पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्वक साथ रहने का पूरा अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को उनके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र ने अंकिता सिंह एवं अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्होंने 11 मई 2026 को अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया है। दोनों बालिग हैं, उनका यह पहला विवाह है और उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है। इसके बावजूद विवाह से नाराज परिवार वाले उन्हें धमका रहे हैं और उनके वैवाहिक जीवन में बाधा डाल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख
सुनवाई के दौरान अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा भगवान दास बनाम दिल्ली राज्य मामलों में दिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है और ऐसे मामलों में धमकी या उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी भी सुरक्षा संबंधी समस्या पर दंपति संबंधित एसएसपी या एसपी से संपर्क कर सकते हैं। साथ ही उन्हें दो माह के भीतर विवाह का पंजीकरण कराने का निर्देश दिया गया है, अन्यथा न्यायालय द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा स्वतः समाप्त हो जाएगी।
ठोस सबूत के बगैर हत्या जैसे मामले में सम्मन नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट
वहीं एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि ठोस सबूत के बगैर किसी को हत्या जैसे मामले में सम्मन नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार दशम ने की है। इसी के साथ कोर्ट ने बुलंदशहर के अहमदगढ़ थाने में वर्ष 2013 में दर्ज हत्या के मामले में मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें दो अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302 यानी हत्या के आरोप में ट्रायल के लिए तलब किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार मामले में नए सिरे से विचार करना होगा। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने फाइल के कागजात की ठीक से जांच नहीं की और कारण बताए बगैर सम्मन जारी कर दिया।
मामले के तथ्यों के अनुसार तीन नवंबर 2013 रात गांव के चौकीदार राजेंद्र ने थाने में सूचना दी कि अनोखे लाल का पुत्र राहुल शराब के नशे में महाराज सिंह की छत से गिर गया और अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मृतक के भाई प्रदीप कुमार ने आईपीसी की धारा 302 के तहत थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। आरोप लगाया कि लाला और महेश ने राहुल को अपने घर शराब पिलाई फिर सिर पर हमला कर मार डाला।
पुलिस ने जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि आरोपियों के खिलाफ कोई केस नहीं बनता। इससे असंतुष्ट शिकायतकर्ता ने आपत्ति दाखिल की। मजिस्ट्रेट ने परिवाद मान लिया। उसके बाद सात गवाहों के बयान हुए और मजिस्ट्रेट ने दोनों अभियुक्तों लाला व महेश को ट्रायल के लिए तलब कर लिया। मजिस्ट्रेट के आदेश को पुनरीक्षण अदालत में चुनौती दी गई तो वहां भी सम्मन को सही ठहराया गया। हाईकोर्ट में दोनों आदेशों को चुनौती दी गई।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को सम्मन करने से पहले पांच जरूरी बातें देखनी थीं। पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट क्यों लगाई, इसके कारण क्या थे। अगर पुलिस से असहमत हैं तो कौन सा ठोस सबूत है जो केस बनाता है। गवाहों के बयानों में कोई बात बढ़ाई या छिपाई तो नहीं गई। मामला सिर्फ परिस्थितिजन्य सबूत पर है तो सभी कड़ियां आरोपियों से जुड़ना चाहिए थीं। हत्या जैसे गंभीर अपराध में सम्मन का आदेश लिखते समय दिमाग लगाने की वजह बतानी थीं। कोर्ट ने दोनों आदेश रद्द करते हुए कहा कि वजह व 35 हजार रुपये रखने की बात बाद में जोड़ी गई। एफआईआर में इसका जिक्र तक नहीं था और गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खा रहे थे।




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