सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति को अवैध घोषित करने का हाईकोर्ट ने रद्द किया आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद शिक्षक मदन मोहन गौतम की नियुक्ति को अवैध घोषित करने वाले 28 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के बाद शिक्षक मदन मोहन गौतम की नियुक्ति को अवैध घोषित करने वाले 28 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने दिया है। कोर्ट ने इस मामले में जिला विद्यालय निरीक्षक हाथरस और संयुक्त शिक्षा निदेशक अलीगढ़ को व्यक्तिगत रूप से तलब किया था। अदालत में उपस्थित अधिकारियों ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता 31 जुलाई 2025 को अपनी 32 वर्ष की सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुका था, जबकि विवादित आदेश उसके बाद बिना किसी उचित जांच और पक्ष रखे (एकपक्षीय) जारी किया गया था। अधिकारियों ने इस त्रुटि के लिए बिना शर्त माफी मांगते हुए स्वीकार किया कि उक्त आदेश कानूनी रूप से गलत था।
अदालत ने अधिकारियों की माफी को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ कोई सख्त दंडात्मक कार्रवाई तो नहीं की, लेकिन विवादित आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के विशेष सचिव को निर्देश दिया है कि यदि इस मामले में कोई नई जांच शुरू की जाती है, तो वह पूरी तरह से कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी आगामी कार्यवाही में प्रभावित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना अनिवार्य है और इसमें न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए विधिक सिद्धांतों का पालन किया जाए। इसी के साथ उच्च न्यायालय ने इस याचिका को निस्तारित कर दिया है।
त्वरित न्याय चाहिए तो सिस्टम तैयार करना होगा: हाईकोर्ट
वहीं दूसरे मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि त्वरित न्याय चाहिए तो सिस्टम तैयार करना होगा। यदि सिस्टम पंगु रहेगा तो मुकदमों के निस्तारण में सहयोग न मिलने से न्याय व्यवस्था विफल होगी ही। वर्षों से राज्य विधि कार्यालय में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी स्टाफ के रिक्त पदों को भरने की कार्यवाही नहीं की। दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद महाधिवक्ता ने भर्ती प्रक्रिया शुरू की। कोर्ट ने राज्य सरकार या महाधिवक्ता से स्टाफ के रिक्त पदों के भरने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है। साथ ही कहा कि राज्य सरकार के सचिव हलफनामा दाखिल करें और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कोर्ट सख्त रुख अपनाएगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सूबेदार यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। सुनवाई शुरू हुई तो सरकारी वकील ने बताया कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है। इस पर कोर्ट ने डीएम को तलब करना चाहा तो अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता पीके साही ने बताया कि जानकारी उन्हें वाट्सएप पर मिली है लेकिन डाउनलोड न होने के कारण वह देख नहीं सके। इस पर कोर्ट ने डीएम को तलब नहीं किया।
वर्षों से खाली पदों को भरा नहीं गया
कोर्ट ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि अधिकारियों द्वारा समय से जानकारी नहीं दी जाती, जिससे केस की सुनवाई बाधित होती है। सरकारी वकीलों को भी समय से फाइल नहीं मिल पाती जिससे वे अपडेट नहीं हो पाते और न्याय प्रशासन में असुविधा होती है। अपर महाधिवक्ता अमित सक्सेना व मुख्य स्थायी अधिवक्ता मनोज कुमार सिंह ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार के विधि अधिकारी कार्यालय में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की कमी है। वर्षों से रिक्त पदों को भरा नहीं गया। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर महाधिवक्ता ने भर्ती कार्यवाही शुरू की है। इस पर कोर्ट ने कहा कि न्यायालय के मामले को प्राथमिकता देनी चाहिए। केस के निस्तारण में बेंच बार दोनों की भूमिका होती है। सुनवाई में सहयोग न मिल पाना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना है।




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