पति से तलाक लिए बिना किसी और के साथ रहने लगी महिला, फिर मांगा गुजारा भत्ता; जानें कोर्ट का आदेश
अधिवक्ता द्वय का कहना था कि महिला याची की वैध पत्नी नहीं है इसलिए उसके पक्ष में गुजारा भत्ता देने का परिवार न्यायालय का आदेश विधि विरुद्ध है। महिला की शादी शारदा प्रसाद से हुई थी। उससे अदालत के माध्यम से तलाक नहीं लिया और याची के साथ बतौर पत्नी रहने लगी। पिछले दिनों एक अन्य महत्वपूर्ण फैसला आया था।

यूपी के चित्रकूट में एक महिला अपने पति से तलाक लिए बिना दूसरे शख्स के साथ रहने लगी। फिर कुछ समय बाद उसने परिवार न्यायालय में गुजारा भत्ता की मांग कर दी। परिवार न्यायालय से महिला के पक्ष में निर्णय भी आ गया। इस निर्णय के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई जिस पर हाई कोर्ट ने महिला को गुजारा भत्ता देने के परिवार न्यायालय के आदेश के अमल पर रोक लगा दी है। महिला को नोटिस जारी करते हुए तीन हफ्ते में याचिका पर जवाब मांगा गया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने संतोष कुमार की याचिका पर अधिवक्ता जयदीप त्रिपाठी और अजय कुमार पांडेय को सुनकर दिया है। अधिवक्ता द्वय का कहना था कि महिला याची की वैध पत्नी नहीं है इसलिए उसके पक्ष में गुजारा भत्ता देने का परिवार न्यायालय का आदेश विधि विरुद्ध है। महिला की शादी शारदा प्रसाद से हुई थी। उससे अदालत के माध्यम से तलाक नहीं लिया और याची के साथ बतौर पत्नी रहने लगी।
उसने परिवार न्यायालय में गुजारा भत्ता के लिए अर्जी दी, जिस पर प्रधान पारिवारिक न्यायाधीश ने महिला को दो हजार और बच्ची को एक हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। अधिवक्ता द्वय का कहना था कि महिला को गुजारा भत्ता पाने का अधिकार नहीं है। उसने स्वीकार किया है कि शादी की है लेकिन शादी में सप्तपदी नहीं हुई थी इसलिए परिवार न्यायालय का आदेश रद्द किया जाए। कोर्ट ने मुद्दा विचारणीय मानते हुए प्रधान पारिवारिक न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाते हुए विपक्षियों से याचिका पर जवाब मांगा है।
पति की कमाई के इतने प्रतिशत पर पत्नी का हक
बता दें कि पिछले दिनों गुजारा भत्ता के एक अन्य केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट से एक महत्वपूर्ण फैसला आया था। इसमें कहा गया था कि भरण पोषण राशि पति की आय के लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र की पुनरीक्षण अर्जी पर दिया था। याचिका में अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर के 26 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। परिवार न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 127 के तहत पत्नी को दिए जाने वाले भरण-पोषण भत्ते को 500 रुपए से बढ़ाकर तीन हजार रुपए प्रतिमाह कर दिया था। इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
अदालत ने अभिलेखों का अवलोकन करते हुए माना कि विपक्षी पुनरीक्ष्रणकर्ता की विधिवत विवाहित पत्नी है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक दायित्व है। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति मजदूर भी है तो वह प्रतिदिन लगभग 600 रुपए कमा सकता है जिससे उसकी मासिक आय करीब 18 हजार रुपए होती है। हाई कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण राशि पति की आय के लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी।




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