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पति की कमाई के इतने प्रतिशत पर पत्नी का हक, गुजारा भत्ता केस में हाई कोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण राशि पति की आय के लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र की पुनरीक्षण अर्जी पर दिया है। याचिका में अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर के 26 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

Tue, 13 Jan 2026 10:36 PMAjay Singh विधि संवाददाता, प्रयागराज
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पति की कमाई के इतने प्रतिशत पर पत्नी का हक, गुजारा भत्ता केस में हाई कोर्ट का फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी को पति की कमाई का 25 प्रतिशत तक गुजारा भत्ता के तौर पर पाने का अधिकार है। कोर्ट ने पत्नी के गुजारे भत्ते की राशि में वृद्धि करने के आदेश को सही करार दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र की पुनरीक्षण अर्जी पर दिया है। याचिका में अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर के 26 जुलाई 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। परिवार न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 127 के तहत पत्नी को दिए जाने वाले भरण-पोषण भत्ते को 500 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया था। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

पुनरीक्षणकर्ता सुरेश चंद्र की ओर से दलील दी गई कि वह एक मजदूर है और सीमित आय में कठिनाई से जीवन यापन करता है। यह भी कहा गया कि भरण-पोषण राशि को छठी बार बढ़ाया गया है, जो अनुचित है, तथा निचली अदालत ने सभी तथ्यों पर समुचित विचार नहीं किया। वहीं राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में 3000 रुपये प्रतिमाह की राशि न तो अधिक है और न ही पति की आय से परे है।

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अदालत ने अभिलेखों का अवलोकन करते हुए माना कि विपक्षी पुनरीक्षणकर्ता की विधिवत विवाहित पत्नी है और स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक दायित्व है। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति मजदूर भी है तो वह प्रतिदिन लगभग 600 रुपये कमा सकता है, जिससे उसकी मासिक आय करीब 18 हजार रुपये होती है।

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सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा, कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी और कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण राशि पति की आय के लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

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