पुलिस हिरासत में मौत में 2 दरोगा और डॉक्टर को सजा, 29 साल पुराने केस में कोर्ट का फैसला
29 साल पहले पुलिस हिरासत में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत में सुंदरपुर चौकी के तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह, विवेचक राधेश्याम और सरकारी डॉक्टर केके जैन को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।
यूपी के वारणसी कोर्ट ने 29 साल पहले पुलिस हिरासत में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत में सुंदरपुर चौकी के तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह, विवेचक राधेश्याम और सरकारी डॉक्टर केके जैन को दोषी ठहराया। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी ने सोमवार को तीनों दोषियों को अलग-अलग सजा सुनाई। तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल जेल और 31 हजार अर्थदंड लगाया। सरकारी डॉक्टर केके जैन को पांच साल कारावास और 40 हजार जुर्माने का दंड दिया गया। विवेचक राधेश्याम को छह महीने कारावास और एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा भुगतनी होगी। मामले में आरोपी सिपाही अनिरुद्ध यादव और श्रीनिवास शुक्ल बरी कर दिए गए। तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट अवधेशमणि त्रिपाठी और कवींद्र नारायण सिंह पहले दोषमुक्त हो चुके हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, सीबीसीआईडी निरीक्षक श्रीकांत पांडेय 15 अप्रैल, 1998 को लंका थाने में तहरीर दी। बताया कि बखरिया गांव (जंसा) के राजेंद्र प्रसाद अपने बेटे आकाश की दवा लेने वाराणसी आए थे। वह बस से सुंदरपुर जा रहे थे। सीट के विवाद में उनका किसी यात्री से विवाद हो गया। सुंदरपुर चौकी के तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने उन्हें पकड़ लिया। उन्होंने उनके ऊपर बस यात्री दयाराम की जेब से सौ रुपये निकालने का आरोप लगाकर खूब पिटाई की। उनके सहयोगियों ने भी पीटा। बुरी तरह पिटाई से उनकी उसी शाम पुलिस चौकी में मौत हो गई। सीबीसीआईडी निरीक्षक की तहरीर पर लंका थाने में मुकदमा दर्ज हुआ। मृतक की पत्नी ने मानवाधिकार आयोग में आरोपियों की शिकायत की थी। इस आधार पर आयोग ने सीबीसीआईडी को मामले की जांच की जिम्मेदार सौंपी थी।
उधर, तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने मृत राजेंद्र प्रसाद सिंह पर लंका थाने में चोरी का मुकदमा दर्ज करा दिया। दरोगा राधेश्याम सिंह की विवेचना में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत को आत्महत्या करार दे दिया गया। बताया गया कि उन्होंने पंखे के सहारे शॉल से फांसी लगाकर जान दे दी। कबीरचौरा अस्पताल में तैनात डॉ. केके जैन ने बीएचयू में उनके शव का पोस्टमार्टम किया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि फांसी पर लटकने के कारण दम घुटने से राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत हुई। उन्होंने पुलिस के कथन का समर्थन किया। करीब 29 साल पुराने मुकदमे दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया। तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट कवींद्र नारायण सिंह मृतक राजेंद्र प्रसाद सिंह के गांव के रहने वाले हैं। अभियोजन पक्ष की ओर से ओर से सीबीसीआईडी के वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी गंगाशरण और एडीजीसी ह्रदय नारायण द्विवेदी ने पैरवी की।
परिजनों को सूचना दिए बिना किया राजेंद्र के शव का दाह-संस्कार
हिरासत में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत की जानकारी सुंदरपुर पुलिस ने उनके परिजनों को नहीं दी। इतना ही नहीं, परिजनों को सूचित किए बिना ही हरिश्चंद्र घाट पर उनके शव का दाह-संस्कार कर दिया गया। परिजनों को जानकारी हुई तो उन्होंने पूछताछ की। सुंदरपुर चौकी के पुलिसकर्मियों के इधर-उधर की बात करने पर उनकी पत्नी ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत की। मानवाधिकार ने मामले का संज्ञान लेकर सीबीसीआईडी को जांच सौंपी। सीबीसीआईडी के इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने जांच के बाद तत्कालीन थाना प्रभारी हसन अब्बास, अपर नगर मजिस्ट्रेट अवधेशमणि त्रिपाठी सहित आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सीबीसीआईडी ने विवेचना के बाद दस लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए। दो आरोपी अवधमणि त्रिपाठी और कवींद्र नारायण सिंह आरोपमुक्त कर दिए गए। तत्कालीन एसओ हसन अब्बास समेत तीन आरोपियों की सुनवाई के दौरान मौत हो गई। सिपाही श्रीनिवास शुक्ल और अनिरुद्ध यादव साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए।




साइन इन