rajasthan high court diktats of khap panchayat social boycott unconstitutional खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों पर राजस्थान हाई कोर्ट की रोक; बताया असंवैधानिक, Rajasthan Hindi News - Hindustan
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खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों पर राजस्थान हाई कोर्ट की रोक; बताया असंवैधानिक

राजस्थान हाईकोर्ट ने खाप पंचायतों के फरमानों को असंवैधानिक बताते हुए अवैध घोषित किया है। अदालत ने कहा कि सामाजिक बहिष्कार और जुर्माने जैसे आदेश कानून के शासन को कमजोर करते हैं। 

Sat, 11 April 2026 10:24 PMKrishna Bihari Singh पीटीआई, जयपुर
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खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों पर राजस्थान हाई कोर्ट की रोक; बताया असंवैधानिक

राजस्थान हाईकोर्ट ने खाप पंचायतों के मनमाने फरमानों को असंवैधानिक और कानून के राज के लिए बड़ा खतरा बताते हुए इन पर रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक बहिष्कार, 'हुक्का-पानी बंद' करना और भारी जुर्माना लगाना मौलिक अधिकारों तथा मानवीय गरिमा का उल्लंघन है। अदालत ने इन जातिगत मंचों को एक अवैध समानांतर न्यायिक प्रणाली माना है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अदालत ने राज्य सरकार को एक प्रभावी नीति और एसओपी बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही हर जिले में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति के आदेश दिए गए हैं ताकि जिला कलेक्टर और पुलिस प्रशासन ऐसी शिकायतों का समय पर निवारण कर सकें।

सामाजिक बहिष्कार असंवैधानिक

राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने अवैध जाति और खाप पंचायतों को कड़ी फटकार लगाते हुए फैसला सुनाया कि इन पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक जुर्माना लगाना पूरी तरह असंवैधानिक है। ऐसे फरमान कानून के शासन को कमजोर करते हैं और यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है। अदालत ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह सामाजिक बहिष्कार की शिकायतों को रोकने के लिए एक स्पष्ट नीति और एसओपी तैयार करे।

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नोडल अधिकारी नियुक्त करने के आदेश

इसके अलावा अदालत ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए जो जिला कलेक्टर और पुलिस प्रमुख की देखरेख में शिकायतों को सुलझाए। अदालत उन 11 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी जिनमें सिरोही, बाड़मेर, नागौर, बालोतरा, जालोर और जोधपुर जैसे जिलों में जबरदस्ती और सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं के बारे में बताया गया था। याचिकाकर्ताओं ने गुहार लगाई थी कि शिकायतें करने के बाद भी अधिकारी ऐसी संस्थाओं के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहते हैं।

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हुक्का-पानी बंद करने से अलग-थलग पड़ जाते हैं परिवार

अदालत ने कहा कि बार-बार सामने आ रहे ऐसे मामलों को देखते हुए ये जातिगत मंच एक समानांतर न्यायिक प्रणाली की तरह काम करते हैं। खाप पंचायतें बिना किसी कानूनी अधिकार के आदेश जारी करती हैं। किसी व्यक्ति का हुक्का-पानी बंद करने जैसे फरमान लोगों और परिवारों को समाज से अलग-थलग कर देते हैं। ऐसी प्रथाएं इंसान की गरिमा को चोट पहुंचाती हैं। ये प्रथाएं समानता, आजादी और जीवन के अधिकार जैसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। यह फैसला अदालत द्वारा नियुक्त एक समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।

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