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आज शिवचरण माथुर सरपंच भी नहीं बन पाते, सांसद हरीश मीणा का बड़ा बयान

राजस्थान की राजनीति में सादगी बनाम वैभव की बहस एक बार फिर गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद हरीश मीणा ने ऐसा बयान दिया, जिसने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी। 

Mon, 2 March 2026 11:16 AMSachin Sharma लाइव हिन्दुस्तान
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आज शिवचरण माथुर सरपंच भी नहीं बन पाते, सांसद हरीश मीणा का बड़ा बयान

राजस्थान की राजनीति में सादगी बनाम वैभव की बहस एक बार फिर गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेस सांसद हरीश मीणा ने ऐसा बयान दिया, जिसने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी। मीणा ने कहा कि आज की राजनीति में हालात ऐसे हो गए हैं कि शिवचरण माथुर जैसे नेता “सरपंच तक नहीं बन पाते।”

रविवार को जयपुर के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित कार्यक्रम में टोंक-सवाई माधोपुर सांसद हरीश मीणा ने कहा कि पहले की राजनीति और आज की राजनीति में जमीन-आसमान का फर्क है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, “आज विधायक या सांसद बनते ही कोठियां और फार्महाउस खड़े हो जाते हैं। पंचायत स्तर तक जातीय समीकरणों का खेल है। सरपंच बनने से पहले जाति पूछी जाती है, वोटों का गणित पूछा जाता है। आप ही बताइए, आज कौन-सी पंचायत से शिवचरण माथुर सरपंच बन पाते?”

‘वो अलग जमाना था’

मीणा ने राजनीतिक संस्कृति में आए बदलाव पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले नीतियां स्पष्ट होती थीं और नेतृत्व में पारदर्शिता दिखाई देती थी। उन्होंने कहा, “आज पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर अधिकारियों तक को समझ नहीं आता कि करना क्या है। जनता भी असमंजस में रहती है कि मार्गदर्शन किससे ले।”

अपने प्रशासनिक अनुभव का जिक्र करते हुए मीणा ने कहा, “आज सुनने में आता है कि थाने का SHO सीधे मुख्यमंत्री से बात कर लेता है। मैं खुद SP रहा हूं, लेकिन मेरी तो मुख्यमंत्री क्या, डीजी तक से सीधे बात नहीं होती थी। वो अलग जमाना था।”

उन्होंने शिवचरण माथुर की सादगी को याद करते हुए बताया कि वे श्याम नगर स्थित एक साधारण मकान में रहते थे और वहीं से इस दुनिया को अलविदा कहा। “आज मुख्यमंत्री के दौरे की सूचना पांच दिन पहले मिलती है, लाव-लश्कर अलग होता है। पहले ऐसा नहीं था,” मीणा ने कहा।

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जातीय समीकरणों पर सीधा हमला

सांसद मीणा ने कहा कि आज पंचायत से लेकर विधानसभा तक जातीय समीकरणों के आधार पर राजनीति की जा रही है। “सरपंच बनने के लिए भी जाति पूछी जाती है। राजनीति सेवा का माध्यम कम और समीकरणों का खेल ज्यादा बन गई है,” उन्होंने तंज कसा।

उनके इस बयान को प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक कार्यशैली पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। खासतौर पर तब, जब राज्य में चुनावी सरगर्मी धीरे-धीरे तेज हो रही है।

पायलट बोले—सिर्फ नेता ही जिम्मेदार नहीं

कार्यक्रम में मौजूद कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट ने भी मीणा के विचारों से सहमति जताई, लेकिन एक अलग कोण जोड़ दिया। पायलट ने कहा, “जमाना बदल गया है, लेकिन सारा दोष सिर्फ नेताओं पर मढ़ना ठीक नहीं है। बड़े मकान और बंगले सिर्फ विधायकों और सांसदों के ही नहीं, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के भी कम नहीं हैं। इस पर भी चर्चा होनी चाहिए।”

पायलट ने सत्ता संचालन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार बनाने का उद्देश्य केवल सत्ता सुख नहीं होना चाहिए। “मुखिया को कम से कम 70% समय प्रशासन, क्रियान्वयन और विकास कार्यों में देना चाहिए। बाकी 30% समय राजनीति के लिए पर्याप्त है। लेकिन आज 80-90% समय राजनीति में ही चला जाता है—कौन कहां फिट होगा, किसे कैसे साधा जाए, इसी में ऊर्जा खर्च होती है।”

‘पॉलिसी मेकिंग आउटसोर्स’ पर भी सवाल

सचिन पायलट ने नीति निर्माण की प्रक्रिया पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बीते कुछ समय में पॉलिसी मेकिंग का काम चुनिंदा अधिकारियों पर “आउटसोर्स” कर दिया गया है। “वही दिशा तय करने लगते हैं। देश में अब बहुत कम ऐसे नेता बचे हैं, जो अपनी सोच और एजेंडे के साथ लक्ष्य हासिल करने आगे बढ़ते हैं,” पायलट ने कहा।

सादगी बनाम सियासत की बहस तेज

शिवचरण माथुर की जयंती के बहाने छिड़ी यह बहस अब सादगी बनाम सियासी वैभव के मुद्दे पर केंद्रित हो गई है। एक तरफ हरीश मीणा का ‘सरपंच भी नहीं बन पाते’ वाला बयान है, तो दूसरी ओर पायलट का ‘अधिकारियों के बंगले भी कम नहीं’ वाला तर्क।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाजी सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक संस्कृति पर सीधा सवाल है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमा सकता है, क्योंकि सवाल केवल एक नेता की सादगी का नहीं, बल्कि राजनीति की बदलती तस्वीर का है।

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