बचपन में मां को खोया, आश्रम में पलीं; ट्रक ड्राइवर की बेटी कैसे बनीं साध्वी प्रेम बाईसा
राजस्थान की कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा (23) का जीवन जितना आध्यात्मिक था, उतना ही संघर्षों और संयोगों से भरा हुआ। बुधवार को जोधपुर में उनका असामयिक निधन हो गया। गुरुवार को पोस्टमॉर्टम के दौरान विवाद की स्थिति बनी, वहीं शाम करीब 6:30 बजे उनका पार्थिव शरीर बालोतरा जिले के परेऊ गांव पहुंचा।

राजस्थान की कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा (23) का जीवन जितना आध्यात्मिक था, उतना ही संघर्षों और संयोगों से भरा हुआ। बुधवार को जोधपुर में उनका असामयिक निधन हो गया। गुरुवार को पोस्टमॉर्टम के दौरान विवाद की स्थिति बनी, वहीं शाम करीब 6:30 बजे उनका पार्थिव शरीर बालोतरा जिले के परेऊ गांव पहुंचा। शुक्रवार को पैतृक गांव परेऊ में ही साध्वी प्रेम बाईसा का अंतिम संस्कार किया जाएगा।
लेकिन साध्वी प्रेम बाईसा का नाम सिर्फ उनकी मौत की वजह से चर्चा में नहीं है, बल्कि उनका पूरा जीवन एक ऐसी कहानी है, जिसमें आस्था, त्याग और संघर्ष के कई अध्याय जुड़े हुए हैं।
बचपन में मां को खोया, पिता ने थामा हाथ
बालोतरा जिले के परेऊ गांव की रहने वाली प्रेम बाईसा महज पांच साल की थीं, जब उनकी मां अमरू बाईसा का निधन हो गया। पिता वीरमनाथ पेशे से ट्रक ड्राइवर थे। ग्रामीणों के मुताबिक अमरू बाईसा बचपन से ही भक्ति-भाव में लीन रहती थीं। पूजा-पाठ, व्रत और साधना उनके जीवन का अहम हिस्सा थे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अमरू बाईसा ने अपनी मौत से एक साल पहले नवरात्रि के व्रत रखे थे। इसकी जानकारी जब वीरमनाथ को हुई तो उन्होंने कहा कि यदि पहले बताते तो वे भी व्रत रखते। इसके बाद पति-पत्नी ने साथ मिलकर चौमासा व्रत रखने का संकल्प लिया।
चौमासा व्रत और घर छोड़ने का फैसला
ग्रामीणों के अनुसार चौमासा व्रत के दौरान चार महीने तक अन्न त्यागने का निर्णय लिया गया। करीब एक महीने और चार दिन तक दोनों ने अन्न ग्रहण नहीं किया। इस बीच परिवार के अन्य सदस्यों ने व्रत तोड़ने का दबाव बनाया, लेकिन वीरमनाथ और अमरू बाईसा अपने निर्णय पर अडिग रहे।
परिवार के दबाव से परेशान होकर दोनों अपनी छोटी बेटी प्रेम बाईसा को साथ लेकर गांव छोड़कर जोधपुर चले गए। यहीं से प्रेम बाईसा के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई।
आश्रम में बीता बचपन, वहीं छिन गई मां की छाया
वीरमनाथ अपने परिवार के साथ जोधपुर के गुरुकृपा आश्रम में रहने लगे। संतों के सान्निध्य में रहकर प्रेम बाईसा का बचपन बीता। भजन, कीर्तन और कथा के बीच उनकी परवरिश हुई।
इसी दौरान प्रेम बाईसा की मां अमरू बाईसा का निधन हो गया। उस समय प्रेम बाईसा महज पांच साल की थीं। मां की मौत के बाद आश्रम ही उनका घर बन गया।
संतों की शरण में मिली पहचान
मां के निधन के बाद प्रेम बाईसा ने गुरुकृपा आश्रम के संत राजाराम जी और संत कृपाराम जी महाराज की शरण ली। यहीं उन्हें आध्यात्मिक शिक्षा मिली। संतों के साथ कथाओं में जाना, भजन गायन और धार्मिक आयोजन उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।
कम उम्र में ही प्रेम बाईसा में कथा वाचन की अद्भुत प्रतिभा नजर आने लगी। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने जोधपुर के पास अपनी पहली कथा की। इसके बाद आसपास के क्षेत्रों में उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ता चला गया।
पैतृक जमीन पर आश्रम, फिर जोधपुर में अलग पहचान
परेऊ गांव के सरपंच बांकाराम के अनुसार वीरमनाथ और प्रेम बाईसा ने गांव की पुश्तैनी जमीन पर एक आश्रम भी बनवाया था। हालांकि बीते दो वर्षों से वे गांव नहीं आए थे और आश्रम खाली पड़ा है। बाद में प्रेम बाईसा ने जोधपुर में अलग से आश्रम स्थापित किया, जिससे उनके भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती गई।
मौत के बाद बढ़ा विवाद
साध्वी प्रेम बाईसा की मौत के बाद विवाद भी सामने आया। एक भक्त रुद्रप्रताप सिंह ने आरोप लगाया कि जोधपुर के आरती नगर स्थित आश्रम में पिता वीरमनाथ शव को अंदर ले जाने से रोक रहे थे और मोबाइल फोन पुलिस को सौंपने से भी मना कर दिया था।
ACP (वेस्ट) छवि शर्मा के हस्तक्षेप के बाद मोबाइल को जब्त किया गया और शव को एमजीएच मॉर्च्यूरी भेजा गया। ACP के अनुसार, परिजनों की रिपोर्ट में बताया गया है कि साध्वी की तबीयत पिछले दो दिनों से खराब थी और इंजेक्शन लगने के बाद उनकी हालत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
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