मुफ्त इलाज में कोताही; SC का दिल्ली के 51 प्राइवेट अस्पतालों को अवमानना नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज और बेड नहीं देने के लिए दिल्ली के 51 प्राइवेट अस्पतालों को कंटेम्प्ट नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च अदालत ने जमीन की एजेंसियों की भी खिंचाई की है।

सुप्रीम कोर्ट ने गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज और बेड नहीं देने पर सख्त रुख अपनाते हुए दिल्ली के 51 प्राइवेट अस्पतालों को कंटेम्प्ट नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च अदालत ने सरकार और जमीन देने वाली एजेंसियों को इस मामले में लापरवाही बरतने के लिए कड़ी फटकार लगाई है। दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव को इस मामले में नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है ताकि दोषी अस्पतालों और सुस्त अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सके।
छूट वापस क्यों न ली जाए?
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा कि इन अस्पतालों को नोटिस जारी किया जाए। 51 अस्पतालों से पूछा जाए कि सर्वोच्च अदालत के आदेश का उल्लंघन करने के लिए उनके खिलाफ कंटेम्प्ट की कार्रवाई क्यों न की जाए। दिल्ली सरकार की ओर से इन अस्पतालों को दी गई छूट क्यों न वापस ली जाए।
51 अस्पतालों को कंटेम्प्ट नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव को ऐसे सभी उपाय और कार्रवाई करने के लिए नोडल ऑफिसर नियुक्त किया। साथ ही नोडल ऑफिसर को उन 51 अस्पतालों को कंटेम्प्ट नोटिस देने का निर्देश दिया गया है जिन्हें रियायती रेट पर सरकारी जमीन दी गई थी। साथ ही DDA, लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस और एमसीडी को नोडल ऑफिसर के साथ सहयोग करने का आदेश दिया गया है।
नोडल ऑफिसर को दी पावर
सर्वोच्च अदालत ने 24 फरवरी को दिए अपने आदेश में कहा कि यदि ऊपर बताए गए ऑफिस की तरफ से कोई कमी पाई जाती है तो नोडल ऑफिसर एक्शन लेने के लिए जिम्मेदार होंगे। केस की अगली सुनवाई 24 मार्च को होगी।
2018 का है फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश अपने 2018 के एक फैसले की निगरानी के दौरान दिया जिसमें प्राइवेट अस्पतालों को मुफ्त इलाज की भी जिम्मेदारी दी गई थी। इन सभी अस्पतालों को समय-समय पर अनुपालन रिपोर्ट भी देनी थी।
क्या थी शर्तें?
दरअसल, अस्पतालों को जमीन देने की शर्त यह थी कि अस्पताल अपने इन-पेशेंट डिपार्टमेंट (IPD) में 10 फीसदी बेड और OPD में 25 फीसदी सेवा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मरीजों को देंगे।
सख्त कार्रवाई नहीं की गई
दिल्ली सरकार ने 18 फरवरी को एक हलफनामा दिया था। इसमें 51 अस्पतालों के नाम थे। यह एफिडेविट 21 जनवरी के ऑर्डर के जवाब में फाइल किया गया था। इस ऑर्डर में कोर्ट के 2018 के फैसले को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी गई थी। अदालत ने 24 फरवरी के ऑर्डर में कहा कि हमारा मानना है कि इस कोर्ट के 9 जुलाई, 2018 के ऑर्डर का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की गई है।
तीनों एजेंसियों को भेजा था पत्र
दिल्ली सरकार का कहना था कि चूंकि इन अस्पतालों की जमीन लीज DDA, L&DO और MCD ने जारी की थी इसलिए डिफॉल्ट अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तीनों एजेंसियों को पत्र भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार के इस जवाब से संतुष्ट नहीं थी।
क्या बोली सरकार?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि दिल्ली सरकार के लेटर का DDA, L&DO, MCD ने कोई जवाब नहीं दिया या उन पर कोई कार्रवाई ही नहीं की। पूरी कार्रवाई लापरवाही से की गई। दिल्ली सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने बताया कि पिछले साल जिन 14 अस्पतालों को नोटिस दिया गया था उनका प्रदर्शन 25 प्रतिशत ओपीडी सेवा की सीमा के मुकाबले 1 से 10 प्रतिशत के बीच रहा। आईपीडी के मामले में भी एक अस्पताल को छोड़कर बाकी सभी 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस कोटे को पूरा करने में नाकाम रहे।
EWS मरीजों को मुफ्त इलाज नहीं दिया जा रहा
एफिडेविट में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय की रिपोर्ट और अस्पतालों के जवाब से यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है और EWS मरीजों को मुफ्त इलाज नहीं दिया जा रहा है। रियायती दरों पर जमीन पाने वाले कुल 63 अस्पताल गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करने के लिए बाध्य हैं लेकिन केवल 56 अस्पताल ही चल रहे हैं। इन अस्पतालों में गरीब मरीजों को मुफ्त सुविधाएं दिलाने के लिए सरकारी संपर्क अधिकारी तैनात किए गए हैं।
किन्हें मिलेगा फ्री इलाज?
इस साल दिल्ली सरकार ने 2 जनवरी को EWS मरीजों के फ्री इलाज के लिए इनकम का दायरा 2.20 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया है। यह दिल्ली हाई कोर्ट के 2023 के एक फैसले के अनुरूप है। इसमें प्राइवेट स्कूलों में EWS एडमिशन के लिए 5 लाख रुपये इनकम का पैमाना लागू किया गया था। ये स्कूल भी जमीन अलॉटमेंट डीड के तहत इस क्लॉज से बंधे थे।




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