जस्टिस स्वर्ण कांता के खिलाफ बोल केजरीवाल समेत 6 नेता फंसे, संजय सिंह और सौरभ भारद्वाज भी
दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, सौरभ भारद्वाज और संजय सिंह समेत अन्य 'आप' नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि केजरीवाल ने अदालत को डराने और न्यायपालिका की छवि बिगाड़ने के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चलाया।

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, विनय मिश्रा, दुर्गेश पाठक और सौरभ भारद्वाज समेत आम आदमी पार्टी के 6 नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है। अदालत के अनुसार, इन्होंने अदालती आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बजाय सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो और लेटर के जरिए न्यायपालिका के खिलाफ दुष्प्रचार किया। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि यह निजी हमला नहीं बल्कि संवैधानिक संस्था को डराने की कोशिश थी जिसे नहीं रोकने पर अराजकता फैल सकती है। कोर्ट ने कहा कि किसी जज की आलोचना अपराध नहीं है लेकिन दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाना और जजों को धमकाना गंभीर अवमानना है।
इन नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने गुरुवार को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, विनय मिश्रा, सौरभ भारद्वाज और दुर्गेश पाठक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू की। जस्टिस शर्मा ने कहा कि मेरे केस से हटने से इनकार करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने कानूनी उपायों का सहारा लेने यानी सुप्रीम कोर्ट में आदेश को चुनौती देने के बजाय मेरी साख को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर मेरे खिलाफ बदनामी का एक सोची-समझी मुहिम चलाई।
अदालत को बदनाम करने की कोशिश
‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि केजरीवाल ने इस अदालत पर राजनीतिक प्रभाव होने का आरोप लगाया। केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी यह विश्वास नहीं कर सकता कि यह अदालत न्याय कर सकती है। केजरीवाल ने इस देश के नागरिकों की ओर से बोलने का अधिकार कैसे मान लिया? ऐसा बयान मुझ पर लांछन लगाने जैसा है। यह अदालत को बदनाम करने और उसकी गरिमा को कम करने के बराबर हैं।
ऐसे आचरण पर रोक लगाना जरूरी
अदालत ने कहा कि यदि केजरीवाल के आचरण को लेटर जारी करने के संदर्भ में देखा जाए तो पता चलता है कि यदि कोई मुकदमाबाज किसी जज को पसंद नहीं करता तो वह कार्यवाही में हिस्सा लेने से इनकार कर सकता है और लेटर जारी कर सकता है। केजरीवाल के इस अभियान से यह संदेश गया कि यदि कोई जज किसी राजनीतिक हस्ती की उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं करता तो उसे बदनाम किया जाएगा। इस अदालत का मानना है कि यदि ऐसे आचरण पर रोक नहीं लगाई गई तो न्याय ही इसका शिकार बन जाएगा।
संजय सिंह की कारगुजारियां भी अवमानना
अदालत ने संजय सिंह की कारगुजारियों को भी अवमानना माना। अदालत ने कहा कि संजय सिंह ने केजरीवाल का वीडियो री-शेयर किया। उन्होंने कहा कि जब कोई जज आरएसएस के कार्यक्रम में जाता है तो उससे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यह बयान यह दिखाने की कोशिश है कि यह अदालत किसी एक विचारधारा की तरफ राजनीतिक रूप से झुकी हुई है। यह साफ तौर पर कोर्ट की अवमानना है। यह आपराधिक अवमानना के समान है।
सौरभ भारद्वाज पर भी ऐक्शन
अदालत ने सौरभ भारद्वाज की कारगुजारियों का जिक्र करते हुए कहा कि एक प्रेस कांफ्रेंस में सौरभ ने कहा था कि BJP का हाई कोर्ट के जज से क्या रिश्ता है? उन्होंने सरेआम इस कोर्ट की ईमानदारी और निष्पक्षता पर सवाल उठाया था। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को आम आदमी पार्टी के यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया गया था। इसे एक्स अकाउंट पर भी शेयर किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस मामला पहली बार कोर्ट के सामने लिस्ट होने के एक दिन बाद हुई थी। खासकर तब जब कोर्ट के सामने कोई भी पक्ष मौजूद नहीं था।
अदालत ने आगे कहा कि सार्वजनिक रूप से यह पूछना कि हाई कोर्ट के किसी मौजूदा जज का किसी पार्टी से क्या रिश्ता है? यह न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष आलोचना नहीं है। यह अवमानना है। यह अदालत आपको अवमानना का दोषी करार देती है।
विनय मिश्रा भी लपेटे में
अदालत ने आगे कहा कि विनय मिश्रा ने भी इसी तरह की पोस्ट की थी। उन्होंने वही वीडियो पोस्ट किया था। इससे अधिक अवमानना वाली बात और क्या हो सकती है? यह आदेश BJP मुख्यालय में नहीं कोर्ट में दिया जा रहा है। विनय मिश्रा मैं आपके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू कर रही हूं। यही मेरा जवाब है।
न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं
जस्टिस शर्मा की अदालत ने कहा कि यह कार्रवाई किसी गुस्से की वजह से नहीं की जा रही है। एक जज के तौर पर वह सभी का सम्मान करती हैं लेकिन कुछ लोगों ने न्यायपालिका की ईमानदारी पर सवाल उठाए और जज के परिवार को बदनाम किया। कोर्ट ऐसी कोशिशों को बर्दाश्त नहीं करेगी जो न्याय देने के सिस्टम को कमजोर करती हों। यह सब आपराधिक अवमानना है क्योंकि इसका मकसद कोर्ट को डराना और बदनाम करना था।
चुप रह जाती लेकिन संस्था को बचाने के लिए बोलना पड़ा
जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि जब तक लोग सिस्टम को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे वह आदेश देती रहेंगी। मेरे लिए चुप रहना आसान था लेकिन संस्था को बचाने के लिए बोलना जरूरी था। सही आलोचना और न्यायपालिका पर हमले के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है। कोर्ट को पता चला कि सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ एक सोची-समझी योजना के तहत अभियान चलाया गया था। इसमें अधूरे वीडियो और चिट्ठियों का सहारा लिया गया जो हद पार करने जैसा था।
यह निजी हमला नहीं, पूरे सिस्टम पर चोट
जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह केवल एक निजी हमला नहीं वरन पूरे सिस्टम पर चोट थी। जज किसी राजनीतिक विचार से काम नहीं करते हैं। जान-बूझकर सिस्टम को बदनाम करने की कोशिश की गई है। कोई भी झूठ बार-बार बोलने से सच नहीं हो जाता है। कोई भी इंसान कितना भी ताकतवर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। जब मैंने एक पॉलिटिकल हस्ती के खिलाफ फैसला दिया तो उन्हें यह पसंद नहीं आया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाय दूसरा रास्ता चुना और एक लेटर लिखा... उन्होंने न सिर्फ इसे सोशल मीडिया पर डाला वरन एक वीडियो भी बनाया जो फेब्रिकेटेड था।




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