PWD बनाता तो 5-10 साल में ही गिर जाती; विधानसभा की इमारत को लेकर प्रवेश वर्मा का अपने ही विभाग पर तंज
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि तथ्य-आधारित बहसें न केवल संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत करती हैं बल्कि उनकी गरिमा को भी बढ़ाती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी बहसों, जिनमें सहमति और असहमति दोनों शामिल होती हैं, ने भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक मंचों पर एक मार्गदर्शक शक्ति के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाया है।

दिल्ली विधानसभा में गुरुवार को एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने साल 1924 से 1930 तक केंद्रीय विधानसभा की कार्यवाही पर आधारित 89 खंडों की एक किताब का विमोचन किया। इस कार्यक्रम में दिल्ली सरकार के विधायी कार्यमंत्री व लोक निर्माण विभाग के मंत्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा भी मौजूद थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने विधानसभा की ऐतिहासिक इमारत की जमकर तारीफ की और इस दौरान ऐसा कुछ कहा कि अपने ही विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि मात्र 11 महीनों में बनकर तैयार हुई विधानसभा की ये इमारत 112 से ज्यादा वर्षों से खड़ी हुई है, जबकि अगर मेरा विभाग इसे बनाता तो यह 5-10 साल में ही गिर जाती।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रवेश वर्मा ने कहा,'हमें अभी एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई, जिसमें बताया गया कि सेठ फतेहचंद ने विधानसभा का यह ऐतिहासिक भवन मात्र 11 महीनों में बनवाया था। मैं PWD मंत्री भी हूं, और मैं कहना चाहूंगा कि अगर हमको ये भवन आज बनाने को बोला जाए तो इस काम में कम से कम 2-3 साल तो आराम से लग जाएंगे। मगर उस समय ये भवन केवल 11 महीनों में बना दिया गया था, ये सोचकर भी हमें आश्चर्य होता है कि इतना सुंदर भवन इतने कम समय में कैसे बन गया।'
'PWD बनाता तो 5-10 साल में टूट जाता'
आगे उन्होंने कहा कि 'ये विधानसभा भवन कोई छोटा भी नहीं है, ये बहुत बड़ा भवन है और 22 एकड़ में फैला हुआ है, इसके बावजूद केवल 11 महीनों में यह पूरा भवन बनना, बहुत ही आश्चर्य की बात है। बायचांस (संयोगवश) अगर ये भवन PWD ने बनाया भी होता तो भी ये 5-10 साल में टूट भी जाता। मगर इतने सालों के बाद भी ये भवन और इसकी सुंदरता आज भी खड़ी है और चमक रही है, ये बहुत ही कमाल की बात है।'
विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता की तारीफ की
आगे विधानसभा स्पीकर विजेंद्र गुप्ता की तारीफ करते हुए वर्मा ने कहा कि 'मैं यहां के इतिहास के बारे में या इस भवन के बारे में उतना ही जानता हूं, जितना विजेंद्र गुप्ता जी हमें बता देते हैं। अभी ये किताब लेकर आ रहे हैं, हम उसको पढ़कर इस बारे में और ज्यादा जानेंगे। यहां जिस कमरे में विधानसभा उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट जी बैठते हैं वो पहले वायसराय का कमरा था। ऐसे में इस भवन का इतिहास बहुत है और हमारे स्पीकर साहब जो काम कर रहे हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण काम है और मैं यह अपने दिल से कहना चाहता हूं कि जैसे सेठ फतेहचंद ने 11 महीनों में यह भवन बनाया था, वैसे ही इन्होंने एक साल में इसकी सुंदरता को हमारे इतिहास को पूरा जीवित करके रख दिया है।'

विभाग पर तंज कसने के बाद किया डैमेज कंट्रोल
खुद अपने विभाग का मजाक उड़ाने के बाद आगे डैमेज कंट्रोल करते हुए PWD मंत्री ने कहा, 'विधानसभा अध्यक्ष की इच्छा है कि यहां एक अच्छा संग्रहालय बनना चाहिए, ऐसे में मैं भी हमारे लोकसभा अध्यक्ष से कहूंगा कि आपका पूरा सहयोग हमको मिलेगा तो PWD अच्छा भवन बनाएगा जो आने वाले 100 साल चलेगा। जिससे यहां आकर दिल्ली के बच्चे, देश के बच्चे इतिहास को पढ़ सकेंगे और इतिहास को समझ सकेंगे, वरना कोई भी यहां आकर झूठ बोल देता है कि यहां ऐसा हुआ था, वैसा हुआ था। कुछ भी झूठ परोस देता है। जब ये सारे तथ्य सामने होंगे, किताब सामने होगी, जब सारे डॉक्यूमेंट सामने होंगे, तो कोई भी आदमी झूठ नहीं बोल सकेगा। यहां पर फांसीघर बन गया, कुछ और हो गया।'
इससे पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को दिल्ली विधानसभा में केंद्रीय विधानमंडल (सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली 1924-1930) की कार्यवाही पर आधारित 89 खंडों का विमोचन किया और कहा कि यह दुर्लभ दस्तावेज युवा पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम करेगा। इसके साथ ही संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता और दिल्ली के विधायी कार्य मंत्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा के साथ, बिरला ने विधानसभा की पत्रिका 'विधान चेतना' के पहले अंक की भी शुरुआत की।
अपने संबोधन में बिरला ने इस बात पर जोर दिया कि इन 89 खंडों के संकलन और प्रकाशन से ब्रिटिश शासन के दौरान विधायी कार्यप्रणाली के बारे में जनता की जागरूकता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक दस्तावेज लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले सभी व्यक्तियों के साथ-साथ देश भर के जन प्रतिनिधियों को भी प्रेरित करेगा। बिरला ने दिल्ली विधानसभा भवन के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जहां से ब्रिटिश शासन के दौरान केंद्रीय विधानमंडल संचालित होता था।
बिरला ने कहा कि तथ्य-आधारित बहसें न केवल संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत करती हैं बल्कि उनकी गरिमा को भी बढ़ाती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी बहसों, जिनमें सहमति और असहमति दोनों शामिल होती हैं, ने भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक मंचों पर एक मार्गदर्शक शक्ति के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाया है।




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