किसी के पास मिले पैसों को तब तक रिश्वत नहीं माना जा सकता जब तक कि..; HC ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला
पीठ ने कहा कि जब भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप टिक नहीं पाया, तो बाकी अन्य आरोप भी इतने गंभीर नहीं हैं कि सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा उचित ठहराई जा सके। इसी आधार पर पीठ ने अधिकारी की सेवा में बहाली का आदेश देते हुए निरंतर सेवा लाभ भी प्रदान करने का निर्देश दे दिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी) द्वारा धन प्राप्त करना तब तक रिश्वत नहीं माना जा सकता, जब तक स्पष्ट रूप से यह सिद्ध न हो जाए कि वह राशि किसी अवैध सरकारी लाभ पहुंचाने या पक्षपात के बदले दी गई है। उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही इस धन को लेकर लोकसेवक द्वारा स्पष्टीकरण ना दिया गया हो।
जस्टिस संजीव नरूला की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए केन्द्रीय भंडारण निगम (CWC) के एक अधिकारी को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भ्रष्टाचार का आरोप टिकाऊ नहीं है। इस बारे में नौकरी से हटाए गए इसी अधिकारी ने एक याचिका लगाई थी।
तीन आरोपों के बाद नौकरी से हटा दिया गया था
याचिकाकर्ता केन्द्रीय भंडारण निगम में वरिष्ठ सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत था। उस पर अवैध रिश्वत लेने, कार्य में लापरवाही बरतने और दुराचरण करने जैसे तीन मुख्य आरोप लगाए गए थे। जिसके बाद विभागीय कार्यवाही करते हुए सेवा से हटा दिया गया था। सबसे गंभीर आरोप यह था कि अधिकारी ने गोदाम से माल उठाने वाले पक्षों से अवैध धनराशि प्राप्त की तथा एक व्यापारी से 75 हजार रुपए अपने बैंक खाते में प्राप्त किए।
मामले की जांच के बाद अधिकारी ने वरिष्ठ सहायक प्रबंधक पर लगे आरोपों के कुछ हिस्सों को सही माना था, जिसके बाद विभागीय प्राधिकारी ने रिश्वत का आरोप स्थापित मानते हुए अधिकारी को सेवा से हटाने की सजा दी थी। अपीलीय स्तर पर भी इस निर्णय को बरकरार रखा गया।
अदालत ने कहा- यह साबित नहीं होता कि यह घूस की रकम है
हालांकि जब मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में आया तो कोर्ट ने पाया कि रिश्वत का निष्कर्ष केवल अधिकारी के खाते में 75 हजार रुपए ट्रांसफर होने के आधार पर निकाला गया था, जबकि जांचकर्ताओं के पास यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री नहीं थी कि यह राशि किसी गलत सरकारी लाभ पहुंचाने के बदले दी गई है। पीठ ने कहा कि जिस राशि को पहुंचाने का उद्देश्य अस्पष्ट या अपर्याप्त रूप से समझने लायक हो, वह धनराशि अपने आप रिश्वत का स्वरूप नहीं ले लेती।
ड्यूटी के दौरान सोने का भी लगा था आरोप
याचिकाकर्ता पर लगे अन्य आरोपों पर पीठ ने कहा कि ड्यूटी के दौरान सोने का आरोप भी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हुआ। इस संबंध में रिकॉर्ड में परस्पर विरोधी विवरण मौजूद थे। वहीं मुख्यालय छोड़ने तथा तौल केन्द्र पर अस्थायी कर्मचारी लगाने जैसे आरोप अधिकतम सीमित प्रशासनिक लापरवाही के दायरे में आते हैं।
पीठ ने कहा कि जब भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप टिक नहीं पाया, तब शेष आरोप इतने गंभीर नहीं हैं कि सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा उचित ठहराई जा सके। इसी आधार पर पीठ ने अधिकारी की सेवा में बहाली का आदेश देते हुए निरंतर सेवा लाभ भी प्रदान करने का निर्देश दे दिया।




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