जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अवमानना का तीसरा बड़ा केस, नई बेंच ने केजरीवाल पर क्या कहा
Justice Swarana Kanta Sharma Contempt: यह जज स्वर्ण कांता शर्मा की अवमानना से जुड़ा तीसरा केस है। इस मामले में याचिकाकर्ता ने केजरीवाल के अलावा सौरभ भारद्वाज, गोपाल राय और एक पत्रकार को पक्षकार बनाया है।

Justice Swarana Kanta Sharma Contempt: दिल्ली हाईकोर्ट जज स्वर्ण कांता शर्मा की अवमानना से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी (आप) प्रमुख अरविंद केजरीवाल, पत्रकार सौरव दास और आप नेता गोपाल राय के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हुई। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुग्गल की पीठ ने कहा कि प्रतिवादियों पर अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के आरोप हैं। लगभग इसी तरह के आरोपों पर हमारी बेंच पहले ही अरविंद केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू कर चुकी है। इसलिए दोनों मामलों को एक साथ सुना जाएगा।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुग्गल की खंडपीठ दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई कर रही है। अदालत ने कहा कि वह पहले ही संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर चुकी है। ऐसे में मामलों की संख्या बढ़ाने के बजाय इस नई अवमानना याचिका को भी पहले से लंबित जस्टिस शर्मा के स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना मामले के साथ सुना जाएगा। मामले में अगली सुनवाई 4 अगस्त हो होगी।
इस केस में केजरीवाल के अलावा पत्रकार सौरव दास, आप नेता सौरभ भारद्वाज और गोपाल राय भी पक्षकार हैं। यह याचिका अधिवक्ता अशोक चैतन्य के माध्यम से दायर की गई है। याचिका दाखिल करने से पहले दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता (क्रिमिनल) संजीव भंडारी से सहमति ली गई थी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी सौरव स्वत: संज्ञान वाले मामले में पक्षकार नहीं हैं, इसलिए उन्हें बिना प्रोसेस फीस के नोटिस जारी किए जाएं। अदालत ने उन्हें 4 अगस्त 2026 तक जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि वर्तमान याचिका में जिन दस्तावेजों और सामग्री का सहारा लिया गया है, उसकी प्रतियां प्रतिवादी पहले और दूसरे केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज को भी उपलब्ध कराई जाएं। अदालत ने कहा कि चूंकि स्वत: संज्ञान वाले अवमानना मामले में पहले ही एक एमिकस क्यूरी नियुक्त किया जा चुका है, इसलिए अलग से नया एमिकस नियुक्त करने की जरूरत नहीं है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अशोक चैतन्य ने अदालत से कहा कि मामले में और भी प्रतिवादी हैं। इस पर पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हम मामलों को लगातार बढ़ाते नहीं रह सकते, वरना यह संभालना मुश्किल हो जाएगा। हमने पहले ही एमिकस नियुक्त कर दिया है। हम नोटिस जारी करेंगे और यह सामग्री भी दूसरे सुओ मोटू मामले के साथ जोड़ी जाएगी।”
जस्टिस शर्मा की अवमानना से जुड़ा तीसरा केस
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़े अवमानना मामलों में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ यह तीसरी कार्यवाही है। इस केस को मिलाते हुए कुल दो मामलों की सुनवाई जस्टिस नवीन चावला की पीठ के समक्ष चल रही है। ताजा याचिका में आरोप लगाया गया है कि केजरीवाल और अन्य पक्षकारों ने मिलकर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को निशाना बनाने की साजिश रची।
पहला मामला: जस्टिस शर्मा ने लिया स्वत: संज्ञान
पहला मामला तब सामने आया, जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 14 मई को खुद अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और अन्य आप नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की। आरोप था कि सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से बदनाम करने का अभियान चलाया गया। कोर्ट ने कहा था कि वीडियो, राजनीतिक झुकाव के आरोप और न्यायपालिका को प्रभावित करने वाली सामग्री प्रसारित की गई। इसके बाद जस्टिस शर्मा ने आबकारी नीति से जुड़े मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।
दूसरा मामला: वैभव सिंह की जनहित याचिका
दूसरा मामला अदालत की कार्यवाही के वीडियो रिकॉर्ड और सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने से जुड़ा है। अधिवक्ता वैभव सिंह की ओर से दाखिल जनहित याचिका (PIL) में आरोप लगाया गया कि अरविंद केजरीवाल समेत कुछ AAP नेताओं और पत्रकारों ने कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो रिकॉर्ड और शेयर किए, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों और अदालत की मर्यादा के खिलाफ है। याचिका में कहा गया कि इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता और गरिमा प्रभावित हुई। मामले में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद संबंधित कंटेंट हटाने की मांग भी उठाई गई थी।
अवमानना का मामला कहां से शुरू हुआ
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से जुड़ा अवमानना मामला दिल्ली आबकारी नीति केस की सुनवाई के दौरान शुरू हुआ। यह विवाद तब बढ़ा, जब अरविंद केजरीवाल और अन्य आप नेताओं ने जस्टिस शर्मा की पीठ से मामले की सुनवाई हटाने यानी ‘रिक्यूजल’ की मांग की।
केजरीवाल खुद वकील बने
केजरीवाल खुद वकील बने और जस्टिस शर्मा की अदालत में जिरह को उपस्थित हुए। उनकी ओर से अदालत में यह आशंका जताई गई कि जस्टिस शर्मा के कुछ पारिवारिक और सार्वजनिक संबंधों के कारण निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालांकि, जस्टिस शर्मा ने इन आरोपों को “अनुमानों और इशारों पर आधारित” बताते हुए रिक्यूजल की मांग खारिज कर दी।
सत्याग्रह और जस्टिस शर्मा की अदालत का बहिष्कार
याचिका खारिज होने के बाद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करते हुए जस्टिस शर्मा की अदालत के बहिष्कार का ऐलान किया और उसे सत्याग्रह बताया। इसके बाद सोशल मीडिया पर जस्टिस शर्मा को लेकर कई पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियां वायरल हुईं। आरोप लगा कि इन पोस्ट्स में जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए, उन्हें राजनीतिक रूप से पक्षपाती बताया गया और एक एडिटेड वीडियो भी प्रसारित किया गया।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 14 मई को कहा कि यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और अदालत की निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल और अन्य आप नेताओं ने उनके खिलाफ “सुनियोजित बदनाम करने का अभियान” चलाया। इसके बाद अवमानना कार्यवाही के आदेश जारी हुए।




साइन इन