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ILBS में गरीबों के लिए ‘सीमित’ बेड; हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने आईएलबीएस अस्पताल में गरीबों के लिए आरक्षित सीमित बिस्तरों के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप है कि सरकारी संस्थान होने के बावजूद यहां मुफ्त इलाज का कोटा बहुत कम है।

Wed, 18 March 2026 08:19 PMKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, हेमलता कौशिक, नई दिल्ली
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ILBS में गरीबों के लिए ‘सीमित’ बेड; हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

यकृत एवं पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस) में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षित सीमित बिस्तरों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में संस्थान के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें केवल 10 फीसदी इनडोर बेड और 25 फीसदी ओपीडी मरीजों को मुफ्त इलाज देने की बात कही गई है। इस याचिका पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की दलील है कि पूरी तरह सरकारी वित्त पोषित अस्पताल को प्राइवेट अस्पतालों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए।

दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

अदालत ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए आंतरिम रोगी विभाग में केवल 10 प्रतिशत बिस्तरों व वाह्य् रोगी विभाग (ओपीडी) में 25 प्रतिशत मरीजों को ही मुफ्त उपचार प्रदान करने के यकृत्त एवं पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस) के निर्णय को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया और मुद्दे पर जवाब मांगा।

आईएलबीएस को भी नोटिस

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने गैर सरकारी संगठन सोशल जस्टिस की तरफ से अधिवक्ता अशोक अग्रवाल द्वारा दायर जनहित याचिका पर दिल्ली सरकार एवं आईएलबीएस को नोटिस जारी किया है।

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याचिकाकर्ता की क्या दलील?

याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि आईएलबीएस को यह नीति अपनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिससे यह मुख्य रूप से शुल्क-आधारित चिकित्सा संस्थान में बदल जाए। आईएलबीएस हेपेटाइटिस, सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर जिगर संबंधी बीमारियों में विशेषज्ञता रखने वाला एक प्रमुख सरकारी वित्त पोषित सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान है।

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निर्णय मनमाना, अनुचित और असंवैधानिक

याचिकाकर्ता ने कहा कि यह निर्णय मनमाना, अनुचित व संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह अमीर व गरीब मरीजों के बीच भेदभाव और गरीबों के लिए किफायती एवं समय पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के संवैधानिक अधिकार को नकारता है। न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई 22 अप्रैल के लिए निर्धारित की है। प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है।

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