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42 साल जिंदा लाश बनकर तड़पीं थीं अरुणा शानबाग… हरीश राणा केस से फिर छिड़ी Right to Die की बहस

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को मरने की अनुमति (पैसिव इच्छामृत्यु) दे दी है। वो करीब 13 सालों से मशीनों के सहारे जिंदा हैं। इसके बाद से एक बार फिर मरने का अधिकार (Right to Die) की बहस शुरू हो गई है। भारत में ये बहस सबसे पहले अरुणा शानबाग मामले में शुरू हुई थी। 

Wed, 11 March 2026 03:24 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, गाजियाबाद
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42 साल जिंदा लाश बनकर तड़पीं थीं अरुणा शानबाग… हरीश राणा केस से फिर छिड़ी Right to Die की बहस

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को मरने की अनुमति (पैसिव इच्छामृत्यु) दे दी है। वो करीब 13 सालों से मशीनों के सहारे जिंदा हैं। इसके बाद से एक बार फिर मरने का अधिकार (Right to Die) की बहस शुरू हो गई है। भारत में ये बहस सबसे पहले अरुणा शानबाग मामले में शुरू हुई थी।

सफाईकर्मी ने नर्स से की थी हैवानियत

अरुणा मुंबई के KEM अस्पताल में एक नर्स थीं। 27 नवंबर 1973 को वो अपनी ड्यूटी खत्म करके घर लौट रही थीं। लेकिन तभी अस्पताल के सफाईकर्मी सोहनलाल वाल्मीकि ने उन पर हमला कर दिया। सोहनलाल के ऊपर हैवानियत का भूत सवार था। उसने कुत्ते की चेन से अरुणा का गला घोंटा और उनका रेप किया।

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जिंदा लाश बन गईं थीं अरुणा

हमला इतना घातक था कि उनके दिमाग तक ऑक्सीजन जानी रुक गई। इससे उनका दिमाग बुरी तरह प्रभावित हो गया। रीढ़ की हड्डी में भी गंभीर चोट आई थी। डॉक्टरों के मुताबिक इस हमले के चलते वो वेजिटेटिव स्टेज में चली गईं, यानी अचेत अवस्था में। न बोल सकतीं। न हिल सकतीं। एक आम इंसान जो भी हरकतें करता है, उसे कर पाने में असमर्थ हो गईं- यानी जिंदा लाश बन गईं।

42 सालों तक तड़पती रहीं अरुणा

डॉक्टर उनकी देखभाल में लगे रहे। परिवार वालों ने साथ देना छोड़ दिया। एक एक कर उनसे मिलने वालों की संख्या कम होती चली गई। जिस इंसान के साथ रिलेशनशिप में थीं, उसने भी मिलना जुलना बंद कर दिया और नए सफर की शुरूआत कर ली। अरुणा करीब 42 साल तक तड़प-तड़प कर एक-एक पल जीने को मजबूर बनी रहीं।

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पिंकी विरानी ने लड़ी लड़ाई

जब परिवार-प्यार ने साथ छोड़ दिया, तो एक लेखिका और पत्रकार आगे आईं। साल 2009 में लेखिका और पत्रकार पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगते हुए याचिका दायर की। उन्होंने खुद को अरुणा का “नेक्स्ट फ्रेंड” बताया।

इच्छामृत्यु की अनुमति मिली, लेकिन अटका मामला

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारत में “पैसिव इच्छामृत्यु” को सीमित शर्तों के साथ अनुमति दी। हालांकि अदालत ने अरुणा शानबाग के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी क्योंकि अस्पताल के कर्मचारी उन्हें जीवित रखना चाहते थे। मामला फिर अटक गया।

लेकिन करीब 7 सालों बाद अदालत ने फैसला सुनाया। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने “गरिमा के साथ मरने के अधिकार” को मौलिक अधिकार मानते हुए पैसिव इच्छामृत्यु को पूरी तरह वैध कर दिया। साथ ही “लिविंग विल” की भी अनुमति दी।

पैसिव इच्छामृत्यु- लाइफ सपोर्ट सिस्टम का हटाना

पैसिव इच्छामृत्यु का मतलब है अगर किसी मरीज के ठीक होने की उम्मीद बिल्कुल खत्म हो चुकी है, तो उसे दिए जा रहे लाइफ सपोर्ट सिस्टम या उपचार को हटा दिया जाता है। इसमें डॉक्टर मरीज को मारने के लिए कोई स्पेशल कदम नहीं उठाते, बल्कि केवल ऐसी मशीनों को हटा लेते हैं, जिनकी मदद से उसे जिंदा रखा गया होता है।

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13 सालों से मशीनों के सहारे जिंदा हैं हरीश राणा

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 31 वर्षीय हरीश राणा के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी है। हरीश 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके दिमाग को गंभीर चोट लगी थी।

इसके बाद से करीब 13 सालों से वो वेजिटेटिव स्टेट (अचेत अवस्था) में थे। उन्हें लाइप सपोर्ट सिस्टम के जरिए जीवित रखा गया था। उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितियों को देखते हुए अनुमति दी और केंद्र सरकार से इस विषय पर स्पष्ट कानून बनाने पर भी विचार करने को कहा।

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