इंजीनियर बनने में कुछ ही महीने बाकी थे, इच्छा मृत्यु पाने वाले हरीश राणा के पिता का छलका दर्द
सुप्रीम कोर्ट के इच्छामृत्यु के आदेश देने के बाद मीडिया से बात करने के दौरान हरीश राणा के पिता कई बार भावुक हुए। उन्होंने अपनी आवाज को ऊंचा करके दर्द को छिपाने की कोशिश भी की, मगर दर्द इतना था कि आंसू छलक आए। रुंधे गले से बोले, बेटे को इंजीनियर बनाने का सपना अधूरा रह गया।

सुप्रीम कोर्ट के इच्छामृत्यु के आदेश देने के बाद मीडिया से बात करने के दौरान हरीश राणा के पिता कई बार भावुक हुए। उन्होंने अपनी आवाज को ऊंचा करके दर्द को छिपाने की कोशिश भी की, मगर दर्द इतना था कि आंसू छलक आए। रुंधे गले से बोले, बेटे को इंजीनियर बनाने का सपना अधूरा रह गया। हरीश के साथ हुए एक हादसे ने पूरे परिवार के सपने छीन लिए।
कई प्रतियोगिताएं भी जीतीं थी
‘लाइव हिन्दुस्तान’ से हुई बातचीत के दौरान हरीश के मां और पिता दोनों की आंखें कई बार छलक आईं। हरीश के पिता अशोक राणा ने बताया कि बेटा बचपन से ही पढ़ने में बहुत होशियार रहा। कई प्रतियोगिताएं भी उसने जीतीं थी। उन्होंने बताया कि हरीश सिविल इंजीनियर बनने की तैयारी कर रहा था। हर साल एक लाख रुपये कॉलेज की फीस और 60 हजार हॉस्टल की फीस जमा कर रहे थे।
कुदरत को कुछ और ही मंजूर है
पिता ने बताया कि हादसे के वक्त हरीश आखिरी सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहा था। इंजीनियर बनने में केवल कुछ ही महीने बाकी थे, लेकिन उससे पहले ही एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने पूरे परिवार गम में डाल दिया। फिर कुछ देर ठहरकर कहते हैं कि कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर है।
दर्द को छिपाकर मुस्कुराते रहते हैं पिता अशोक राणा
राज एम्पायर सोसाइटी में रहने वाले 62 साल के अशोक राणा अपने जीवन के सबसे बड़े दुख के बावजूद हमेशा लोगों से मुस्कुराकर मिलते हैं। उनका बेटा हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से एक हादसे के बाद कोमा में है। बेटे की यह हालत किसी भी पिता के लिए बेहद कठिन होती है, फिर भी अशोक राणा ने अपने दुख को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
पीड़ा का अंदाज लगाना मुश्किल
सोसाइटी में रहने वाले हेतराम शर्मा ने बताया अशोक राणा जब भी किसी से मिलते हैं तो हमेशा हंसते हुए और सकारात्मक अंदाज में बात करते हैं। उनके व्यवहार से यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि उनके दिल में कितनी गहरी पीड़ा छिपी हुई है। उन्होंने कभी अपने बेटे की स्थिति को लेकर किसी के सामने दुखी होना प्रतीत नहीं किया। वे हमेशा सामान्य तरीके से लोगों से मिलते-जुलते और हर किसी का हालचाल पूछते हैं। अशोक राणा बेहद मिलनसार और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं।
उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा
चाहे कोई परिचित हो या राह चलता व्यक्ति, वे सभी से आत्मीयता के साथ मिलते हैं। वे दूसरों को भी जीवन में हिम्मत बनाए रखने की सलाह देते हैं। सोसाइटी में ही रहने वाले बीएन शर्मा बताते हैं कि जीवन में आई कठिन परिस्थितियों के बावजूद अशोक राणा ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।
नोएडा में भी इलाज हुआ
अशोक राणा का बड़ा बेटा हरीश राणा चंडीगढ़ के एक कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। 20 अगस्त 2013 को चौथी मंजिल से गिरने की वजह से हरीश को सिर में गंभीर चोट आई और वह उपचार के दौरान कोमा में चला गया। चंडीगढ़ से दिल्ली एम्स तक हरीश राणा का इलाज चला, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। हरीश राणा को बीते साल मई में सेक्टर 39 स्थित जिला अस्पताल में भर्ती किया गया था।
घर चलाने के लिए सैंडविच बेच रहे
अशोक राणा सैंडविच और बर्गर बनाकर आसपास के क्रिकेट मैदानों व अन्य स्थानों पर बेचते हैं। वह पूर्व में एक नामी होटल में शेफ रह चुके हैं। वर्ष 2013 में उनके बड़े बेटे हरीश राणा के एक हादसे के चलते कोमा में चले जाने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। इसके बाद वह गाजियाबाद वापस आ गए और यहां रहकर परिवार का पालन पोषण करने लगे। वह रोजाना सैंडविच और बर्गर तैयार करते हैं और आसपास के इलाकों में बेचते हैं।




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