यौन शोषण पीड़िता का नाम-पता कोर्ट डॉक्यूमेंट में भी प्रकट न करे पुलिस, दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि यौन उत्पीड़न की शिकार महिला या लड़की का नाम, पिता का नाम या पता अदालतों में दायर किसी भी दस्तावेज या रिपोर्ट में प्रकट नहीं किया जाना चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया है कि यौन उत्पीड़न की शिकार महिला या लड़की का नाम, पिता का नाम या पता अदालतों में दायर किसी भी दस्तावेज या रिपोर्ट में प्रकट नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से सभी थानेदारों (एसएचओ) और जांच अधिकारियों को यौन उत्पीड़न की पीड़ितों की पहचान नहीं उजागर करने से संबंधी कानून का सख्ती से पालन करने के लिए उचित निर्देश देने को कहा है।
हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के मामले में एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह निर्देश पारित किया। कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा दायर स्टेटस रिपोर्ट में पीड़िता का उल्लेख है।
हाईकोर्ट ने 14 जनवरी के अपने फैसले में कहा, “संबंधित मोती नगर थाना क्षेत्र के डीसीपी को निर्देश दिया जाता है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र के सभी एसएचओ को इस बात के प्रति संवेदनशील बनाएं कि यौन उत्पीड़न पीड़िता का नाम, पिता का नाम या पता किसी भी स्टेटस रिपोर्ट या अदालत में दायर किए गए दस्तावेज में प्रकट न किया जाए।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा, "दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से अनुरोध है कि वे इस संबंध में सभी एसएचओ और जांच अधिकारियों को कानून का कड़ाई से पालन करने के संबंध में उचित निर्देश दें। इस फैसले की एक कॉपी संबंधित डीसीपी और दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को सूचना और अनुपालन के लिए भेजी जाए।"
वर्तमान मामले में आरोपी ने 2021 में 12-13 वर्ष की नाबालिग लड़की को बहाने से उसके घर से ले जाकर उसका कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया। आरोप है कि उसने लड़की को एक कमरे में बंद कर दिया और उसके साथ दुष्कर्म किया। हालांकि, बाद में उसके परिवार के सदस्यों ने उसे ढूंढ निकाला।
आरोपी ने यह तर्क दिया कि उसका पीड़िता की मां के साथ सहमति से संबंध था और उसे फंसाया गया है, क्योंकि पीड़िता को उनके रिश्ते से आपत्ति थी।
यह भी दावा किया गया कि 2021 में कोविड-19 के कारण लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित थी और सामाजिक संपर्क कम था, इसलिए अभियोजन पक्ष द्वारा बताए गए तरीके से कथित अपराध किए जाने की संभावना संदिग्ध है।
अदालत ने कहा कि मात्र इस तथ्य से कि कथित घटना महामारी काल के दौरान हुई, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि पीड़िता के बयान पर अविश्वास किया जाए या यह मान लिया जाए कि अपराध घटित ही नहीं हो सकता था।
अदालत ने कहा कि आरोपी और पीड़िता की मां के बीच संबंध होना उसकी (महिला की) गवाही पर संदेह करने का आधार नहीं है।




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