दिल्ली दंगा: मैं आतंकी नहीं, शरजील इमाम की दलील; SC में अन्य आरोपियों ने क्या कहा?
साल 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी शरजील इमाम ने जमानत की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दलीलें दी। शरजील इमाम ने अपनी दलील में दिल्ली पुलिस की ओर से 'खतरनाक बौद्धिक आतंकी' बताए जाने पर नाराजगी जताई।

साल 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी शरजील इमाम, उमर खालिद और गुलफिशा ने जमानत की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दलीलें दी। दिल्ली हिंसा की साजिश के आरोप में आतंकवाद निरोधक कानून के तहत जेल में बंद जेएनयू के पूर्व छात्र शरजील इमाम ने दिल्ली पुलिस की ओर से बिना किसी ट्रायल के 'खतरनाक बौद्धिक आतंकवादी' का तमगा दिए जाने पर कड़ा एतराज जताया।
मैं आतंकी नहीं- शरजील इमाम
शरजील इमाम ने कहा कि मैं आतंकवादी नहीं हूं, जैसा कि दिल्ली पुलिस ने कहा है। मैं देशद्रोही भी नहीं हूं, जैसा कि सरकार ने कहा है। मैं इस देश का नागरिक हूं और जन्म से नागरिक हूं और मुझे अब तक किसी भी अपराध के लिए कोई भी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है।
'आपराधिक साजिश' का अपराध नहीं
जस्टिस अरविंद कुमार और एनवी अंजारिया की पीठ के समक्ष जमानत की मांग करते हुए शरजील इमाम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने यह दलील दी। वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने पीठ से कहा कि उनके मुवक्किल को 28 जनवरी 2020 को उसके भाषणों के लिए गिरफ्तार किया गया था। यह दंगों से पहले की बात है, यह हिंसा के लिए 'आपराधिक साजिश' का अपराध नहीं बन सकता।
मेरा मुवक्किल शारीरिक रूप से मौजूद नहीं था
वरिष्ठ अधिवक्ता ने पीठ से कहा कि दिल्ली में हुई हिंसा में मेरा मुवक्किल शारीरिक रूप से मौजूद नहीं था क्योंकि वह कस्टडी में था। यदि पुलिस मुझे जनवरी में हिरासत में लिया होता तो वे कह सकते थे कि इन भाषणों की वजह से हिंसा हुई लेकिन मेरे मुवक्किल का नाम आरोपी के तौर पर नहीं था। दवे ने यह भी कहा कि शरजील के भाषणों की वजह से दंगे नहीं हुए। उस भाषणों के लिए पहले से ही केस चल रहा था।
आपराधिक साजिश का मामला नहीं
इस पर सर्वोच्च अदालत की पीठ ने सवाल किया कि क्या हम आपकी इस दलील को स्वीकार कर सकते हैं कि शरजील इमाम के भाषण आतंकी कृत्य नहीं थे? इस पर दवे ने कहा कि शरजील का भाषण आपराधिक साजिश का मामला नहीं बनेगा और पुलिस को यह साबित करना होगा कि इमाम ने साजिश के लिए कुछ और भी किया था।
इस तरह कैद में नहीं रख सकते- उमर खालिद
वहीं उमर खालिद की ओर से कपिल सिब्बल ने दलील दी। उन्होंने कहा कि फरवरी 2020 में जब दंगे हुए थे तब उनका मुवक्किल दिल्ली में नहीं था। उसे इस तरह कैद में नहीं रखा जा सकता कि जैसे कि आपे कहें कि मैं आपको आपके विरोध प्रदर्शन के लिए दंडित करूंगा। आप किसी और के भाषण को मेरे नाम से जोड़कर यह नहीं कह सकते कि मैं दंगों के लिए जिम्मेदार हूं। मैं एक संस्थान में एक शोधार्थी हूं। ऐसे में मैं सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए क्या कर सकता हूं?
मुकदमा चलाइए
सिब्बल ने अदालत में खालिद के 17 फरवरी, 2020 को अमरावती में दिए गए भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि उसने हिंसा का जवाब शांति से और नफरत का जवाब प्यार से देने की बात कही थी। यह यूएपीए का उल्लंघन कैसे है? यदि आपके पास मेरे खिलाफ कोई मामला है, तो मुझ पर मुकदमा चलाइए या मुझे दोषी ठहराकर जेल भेज दीजिए। आप मुझे इस तरह जेल में नहीं रख सकते हैं।
गुलफिशा फातिमा की क्या दलील?
मामले की एक अन्य आरोपी गुलफिशा फातिमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने जोर देकर कहा कि उन्हें अनंतकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस के सत्ता परिवर्तन के दावे का आरोप-पत्र में कोई उल्लेख नहीं है। फातिमा ने लगभग छह साल का वक्त जेल में बिताया है। अभियोजन पक्ष ने आरोपपत्र में सत्ता परिवर्तन संबंधी आरोप का उल्लेख कहां किया है? असम को भारत से अलग करने की साजिश के आरोप का आधार क्या है?




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