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दिल्ली के हाईवे प्रोजेक्ट्स में बड़ा खेल! कागजों में लगे लाखों पेड़, जमीन पर आधे भी नहीं मिले

UER-2 और द्वारका एक्सप्रेसवे के लिए एनएचएआई द्वारा करोड़ों रुपये देने के बावजूद दिल्ली में वृक्षारोपण के वादे अधूरे हैं। जांच में सामने आया है कि डीडीए द्वारा दावा किए गए पेड़ों में से आधे से ज्यादा गायब हैं।

Thu, 15 Jan 2026 01:56 PMAnubhav Shakya नई दिल्ली, हिंदुस्तान टाइम्स
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दिल्ली के हाईवे प्रोजेक्ट्स में बड़ा खेल! कागजों में लगे लाखों पेड़, जमीन पर आधे भी नहीं मिले

दिल्ली के प्रमुख हाईवे प्रोजेक्ट्स में कंपेंसेटरी वनरोपण की बड़ी खामी सामने आई है। सालों से विकास कार्यों के लिए पेड़ काटने पर बदले में पेड़ लगाने का वादा किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) ने पिछले हफ्ते दिल्ली सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक में UER-2 और द्वारका एक्सप्रेसवे के लिए लाखों पेड़ लगाने में गंभीर कमी बताई।

UER-2: तीसरी रिंग रोड पर पेड़ों का हिसाब अधूरा

UER-2 को दिल्ली की तीसरी रिंग रोड कहा जाता है। यह उत्तर दिल्ली के NH-44 (बंकौली-अलीपुर के बीच) से शुरू होकर बवाना इंडस्ट्रियल एरिया, रोहिणी, मुंडका, बकरवाला और नजफगढ़ से गुजरता है। फिर द्वारका एक्सप्रेसवे से जुड़कर दिल्ली एयरपोर्ट के शिव मूर्ति जंक्शन पर NH-48 पर समाप्त होता है। इसके दिल्ली वाले हिस्से का 17 अगस्त 2025 को रोहिणी में उद्घाटन हुआ था।

एनएचएआई ने 2021 में दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) को 64,080 पेड़ लगाने के लिए 55.10 करोड़ रुपये जमा कराए थे। डीडीए ने अगस्त 2024 में दावा किया कि 57,280 पेड़ लगा दिए गए, लेकिन साइट जांच में सिर्फ 24,887 पेड़ ही मिले। यानी आधे से ज्यादा पेड़ गायब हैं।

यह मुद्दा फरवरी 2025 में चीफ सेक्रेटरी स्तर पर और जून 2025 में केंद्रीय सड़क मंत्री के साथ बैठक में उठाया गया। दिसंबर 2025 में दिल्ली मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली बैठक में भी डीडीए को काम तेज करने के निर्देश दिए गए, लेकिन अब तक सुधार नहीं हुआ।

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द्वारका एक्सप्रेसवे: ट्रैफिक कम हुआ, लेकिन हरियाली का नुकसान

29 किमी लंबा यह एक्सप्रेसवे दिल्ली-गुरुग्राम के बीच NH-48 पर भीड़ कम करने के लिए बनाया गया। इसके लिए 1 लाख 53 हजार 990 पेड़ लगाने थे और एनएचएआई ने 2020 में DDA को 87.77 करोड़ रुपये दिए। DDA ने अगस्त 2024 में बताया कि 1 लाख 51 हजार 452 पेड़ लगा दिए गए, लेकिन संयुक्त जांच में सिर्फ आधे पेड़ ही पाए गए। यह मामला भी चीफ सेक्रेटरी और मुख्यमंत्री स्तर पर उठाया गया। पहले भी कई बैठकों में चर्चा हुई, लेकिन स्थिति जस की तस है।

पर्यावरण एक्सपर्ट्स की चेतावनी

पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन कंधारी कहती हैं कि कागज पर पेड़ लगाने और जमीन पर न मिलने की समस्या सिस्टम की गहरी खामी दिखाती है। उन्होंने कहा, 'यह सिर्फ बॉक्स टिक करने का खेल नहीं है। इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, सही उपकरण, स्पष्ट नियम और लगातार निगरानी जरूरी है। CAMPA जैसे ढांचे में थर्ड-पार्टी जांच और आधिकारिक निरीक्षण का प्रावधान है, लेकिन जमीनी स्तर पर संसाधन कम हैं, ट्रेनिंग नहीं है और जियो-टैगिंग जैसे टूल्स की कमी है।' उन्होंने कहा कि स्टाफ की संख्या बढ़ाना, तकनीकी प्रशिक्षण देना और मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना जरूरी है, ताकि ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स में वादे कागज पर न रह जाएं।

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