एक मकान ने थामी दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की रफ्तार; क्या है 28 साल पुराना विवाद?
प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन कर दिया है, जिससे यात्रा का समय घटकर 2.5 घंटे रह जाएगा। हालांकि, लोनी के मंडोला गांव में 28 साल पुराने एक घर के कानूनी विवाद के कारण एक मुख्य रैंप अधूरा है।

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का काम लगभग पूरा हो चुका है और प्रधानमंत्री मोदी ने इसका उद्घाटन भी कर दिया है, जिससे अब दोनों शहरों के बीच का सफर मात्र 2.5 घंटे का रह जाएगा। हालांकि, गाजियाबाद के लोनी में एक दो-मंजिला घर इस प्रोजेक्ट के मुख्य रैंप के रास्ते में बड़ी बाधा बना हुआ है। यह मकान 28 साल पुराने कानूनी विवाद में फंसा है क्योंकि किसान परिवार ने पुरानी दरों पर मुआवजा लेने से इनकार कर दिया था। विवाद के कारण एनएचएआई को एक वैकल्पिक पतला रास्ता बनाना पड़ा है, जिससे ट्रैफिक जाम की समस्या हो सकती है। फिलहाल मामला अदालत में है। नजरें अदालत के फैसले पर रहेंगी।
मेन रैंप के ठीक रास्ते में खड़ा है मकान
न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे में जब यह एक्सप्रेसवे चालू होने जा रहा है तब एक अजीब रुकावट इसके सुचारू रूप से शुरू होने में बाधा डाल रही है। गाजियाबाद के लोनी के मंडोला गांव में एक दो-मंजिला मकान एक्सप्रेसवे के मेन रैंप के ठीक रास्ते में खड़ा है। इसकी वजह 1998 से चला आ एक कानूनी विवाद है। इससे प्रोजेक्ट का एक अहम हिस्सा अधूरा रह गया है।
किसान ने घर बेचने से कर दिया था इनकार
बता दें कि उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने मंडोला आवास योजना के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में तब अधिकांश भूस्वामियों ने मुआवजा स्वीकार कर लिया था लेकिन वीरसेन सरोहा नाम के किसान ने अपना घर बेचने से इनकार कर दिया था। उन्होंने फैसले को अदालत में चुनौती दी थी। इसके बाद अदालत ने अधिकारियों को संपत्ति का अधिग्रहण करने से रोक दिया था।
बैकल्पिक सड़क बनाई लेकिन संकरी
अदालत में मामला जाने के बाद से विवाद कानूनी पचड़े में उलझा है। कानूनी लड़ाई परिवार की नई पीढ़ी लड़ रही है। इस विवाद का असर मंडोला में एक्सप्रेसवे के मुख्य रैंप के पूरा होने पर पड़ा है। इस हिस्से को पूरा करने के लिए विवादित जमीन के अधिग्रहण की जरूरत है। मामला कानूनी पचड़े में फंसे होने के कारण अधिकारियों ने घर के पीछे एक वैकल्पिक रास्ता बना दिया है। लेकिन, सड़क की चौड़ाई और क्षमता मूल रैंप जितनी नहीं है।
ट्रैफिक जाम की आशंका
विवाद के कारण इस जगह पर सड़क सिंगल सर्विस लेन की तरह काम में आएगी। इसका असर एक बड़े इंटरचेंज पर भी पड़ रहा है जो एक्सप्रेसवे को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे से जोड़ता है। संकरा वैकल्पिक रास्ता होने के कारण ट्रैफिक के सुचारू होने को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। देहरादून से आने वाले वाहनों को इस जगह से गुजरते समय दिक्कतें हो सकती हैं।
मकान मालिक की क्या दलील?
वहीं मकान मालिक के परिवार का कहना है कि इस जमीन को शुरू में अधिग्रहण से बाहर रखा गया था। इसे बाद में प्रोजेक्ट में शामिल किया गया। भूमि अधिग्रहण मौजूदा बाजार मूल्य पर होना चाहिए। ऐसे में जब मूल आवास योजना कभी पूरी ही नहीं हुई तो जमीन का इस्तेमाल किसी दूसरे प्रोजेक्ट के लिए करना अन्यायपूर्ण है। बता दें कि यह मामला 2024 में सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था जिसने इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस पर जल्द से जल्द फैसला लेने का निर्देश दिया था।




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