‘कमजोर कहानी को गहराई…’; शराब घोटाला केस में कोर्ट ने कीं ये 9 अहम टिप्पणियां
दिल्ली के कथित आबकारी नीति घोटाला मामले में ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को अदालत ने न केवल आरोपमुक्त किया, बल्कि क्लीनचिट भी दी है। अदालत ने सीबीआई के आरोपपत्र को ही खारिज कर दिया है। साथ ही ईडी द्वारा दर्ज मुकदमे पर भी सवाल उठाए।
दिल्ली के कथित आबकारी नीति घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को अदालत ने न केवल आरोपमुक्त किया, बल्कि क्लीनचिट भी दी है। अदालत ने सीबीआई के आरोपपत्र को ही खारिज कर दिया है। साथ ही ईडी द्वारा दर्ज मुकदमे पर भी सवाल उठाए। अदालत ने इस केस में अपना फैसला सुनाते हुए अपनी अहम टिप्पणियों में जानें क्या-क्या कहा है।
सीबीआई का आरोप पत्र खारिज, ईडी पर भी सवाल
अदालत ने कहा कि आपने शिकायत दर्ज कर आरोपी की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी। आरोपी के आरोमुक्त होने के बाद अनुचित हिरासत के कारण हुए नुकसान की भरपाई आप कैसे करेंगे। राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज जितेन्द्र सिंह की अदालत ने 598 पेज का फैसला सुनाया। इस फैसले में आरोपियों खासतौर से मनीष सिसोदिया व अरविंद केजरीवाल द्वारा जेल में बिताए समय को उल्लेखित करते हुए अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया कानून के शासन को बनाए रखने के लिए है।
पीएमएलए के मुकदमों से व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में पड़ रही : जज
जज ने कहा कि यह अदालत एक गंभीर व बार-बार उत्पन्न होने वाली दुविधा का सामना कर रही है, जिसमें पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग प्रिवेंशन एक्ट) के तहत शुरू किए गए मुकदमों के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ रही है। कोर्ट ने कहा, यह ऐसी प्रक्रिया है जो अस्थायी व अप्रमाणित आरोप के आधार पर लंबे या अनिश्चितकालीन हिरासत का मार्ग प्रशस्त करती है। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में पड़ रही है।
गिरफ्तारी व लंबी हिरासत अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं : कोर्ट
अदालत ने कहा कि यह मुद्दा उस वक्त और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब किसी आरोपी को मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है। उसके बाद उसे जमानत पाने के लिए निर्धारित कठोर दोहरी शर्तों को पूरा करना पड़ता है। इस वजह से मुकदमे से पूर्व में भी लंबे समय तक आरोपी को हिरासत में रहना पड़ता है, जैसा कि इस मामले में भी हुआ है। अदालत ने कहा कि यह अदालत स्वयं एक ऐसे मामले की गवाह है, जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित कार्यवाही आरोप पर बहस के अंतिम चरण में पहुंच गई है। लेकिन ईडी की तरफ से हर बार कहा जा रहा है कि जांच अभी जारी है। ईडी का जवाब दर्शाता है कि उन्हें अभी पता करना है कि अपराध हुआ भी है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी व लंबी हिरासत अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं। अदालत की यह टिप्पणी आबकारी मामले में ईडी की समांनातर चल रही सुनवाई में खामियों की तरफ इशारा करती है।
साउथ ग्रुप वाक्य इस्तेमाल करने पर फटकार
सीबीआई द्वारा साउथ ग्रुप वाक्य का इस्तेमाल करने पर अदालत ने अपनी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा सीबीआई को भाषा के चुनाव में संयम बरतने की चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि इस तरह के नामकरण का कानून में कोई आधार नहीं है। साउथ ग्रुप वाक्य को कानून से मान्यता प्राप्त नहीं है। इस तरह के वाक्यों का इस्तेमाल कर क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना कानून का दुरुपयोग है। अदालत ने कहा कि यह वाक्य क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला है। पहले ही लोगों में देश के अलग-अलग क्षेत्रों को लेकर गलत धारणा दिखाई देती है। ऐसे में सीबीआई जैसी अग्रणी जांच एजेंसी को क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना चिंतनीय है।
अदालत ने अपनी टिप्पणियों में क्या-क्या कहा
1. सीबीआई का मामला न्यायिक जांच में खरा नहीं उतरा सका। निराधार साबित हुआ है।
2. किसी भी स्वीकार्य साक्ष्य के अभाव में अभियोजन पक्ष का मामला कानूनी रूप से कमजोर, अस्थिर व कानून की दृष्टि से आगे बढ़ने के लिए अनुपयुक्त है।
3. साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि यह नीति संबंधित हितधारकों के साथ विचार-विमर्श व परामर्श के बाद तथा कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए तैयार की गई थी।
4. किसी दोषपूर्ण नीति या स्पष्ट रूप से गैरकानूनी कार्यान्वयन के अभाव में अभियोजन का सिद्धांत केवल अनुमान मात्र रह जाता है।
5. संबंधित संस्थाओं से जुड़े प्रतिबंधों या किसी अन्य नीतिगत शर्त का कोई स्पष्ट उल्लंघन नहीं पाया गया, जिससे आपराधिक मामला बन सकता था।
6. प्रस्तुत दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि जांच के दौरान अलग-अलग टुकड़ों को एक साथ जोड़कर एक विशाल व जटिल साजिश का आभास पैदा करने का प्रयास किया गया, जो कानूनी रूप से मान्य सामग्री द्वारा समर्थित नहीं है।
7. ऐसा प्रतीत होता है कि जांच एक पूर्वनिर्धारित दिशा में आगे बढ़ी है, जिसमें नीति के निर्माण या कार्यान्वयन से जुड़े लगभग हर व्यक्ति को आरोपी बनाया गया है ताकि कमजोर कहानी को गहराई व विश्वसनीयता का भ्रम दिया जा सके।
8. इस तरह के आरोपों को गोवा विधानसभा चुनावों से जोड़कर कथित अपराध की आय के हेरफेर व उपयोग को दर्शाने का प्रयास, कानूनी रूप से मान्य सामग्री की तुलना में अनुमानों पर अधिक आधारित है।
9. अभियोजन पक्ष द्वारा पेश आरोप पत्र में मामला काफी हद तक अनुमानों, अटकलों व ठोस सबूतों के अभाव में किए गए निष्कर्षों पर आधारित है।




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