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बचपन का कैंसर अब नहीं लाइलाज, कैसे 94.5 फीसदी जीत रहे जंग? दिल्ली एम्स का अध्ययन

दिल्ली एम्स के अध्ययन के अनुसार, वयस्कों के मुकाबले बच्चों के कैंसर से ठीक होने की दर काफी बेहतर है। समय पर कीमोथेरेपी और सही इलाज से 94.5 फीसदी बच्चे स्वस्थ हो रहे हैं। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट...

Sat, 14 Feb 2026 05:47 PMKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, रणविजय सिंह, नई दिल्ली
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बचपन का कैंसर अब नहीं लाइलाज, कैसे 94.5 फीसदी जीत रहे जंग? दिल्ली एम्स का अध्ययन

बच्चे ल्यूकेमिया, लिंफोमा जैसे ब्लड कैंसर, आंखों व हड्डियों के कैंसर से अधिक पीड़ित होते हैं लेकिन उनमें इलाज का परिणाम वयस्क मरीजों की तुलना में बेहतर होता है। इसलिए यदि समय पर इलाज मिले तो ज्यादातर बच्चे ठीक हो जाते हैं और वे लंबे समय तक बीमारी मुक्त जीवन व्यतीत कर सकते हैं। एम्स द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आई है। द लैंसेट रीजनल हेल्थ जर्नल में यह अध्ययन प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में कैंसर से पीड़ित 5419 बच्चे शामिल

रविवार को अंतर्राष्ट्रीय बाल कैंसर दिवस के मद्देनजर एम्स में एक जागरूकता कार्यक्रम भी रखा गया है। ताकि लोगों को बच्चों के कैंसर की बीमारी के प्रति जागरूक किया जा सके। बहरहाल, एम्स के पीडियाट्रिक आंकोलॉजी की प्रभारी डॉ. रचना सेठ के नेतृत्व में किए अध्ययन में एम्स सहित 20 अस्पतालों में इलाज कराने वाले कैंसर से पीड़ित 5419 बच्चे शामिल किए गए। इसमें दो से आठ वर्ष की उम्र के कैंसर पीड़ित बच्चे अधिक थे।

पहली बार इतने बड़े स्तर पर अध्ययन

इस अध्ययन का मकसद कैंसर पीड़ित कितने बच्चे कैंसर को मात दे पाते हैं और 5 साल जीवित रहने की दर का पता लगाना था। देश में बाल कैंसर सर्वाइवर को लेकर पहली बार इतने बड़े स्तर पर अध्ययन किया गया है।

बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया ज्यादा

अध्ययन में पाया गया कि बच्चों में एक्यूट ल्यूकेमिया अधिक होता है। इस वजह से 40.9 प्रतिशत मरीज एक्युट ल्यूकेमिया पीड़ित थे। इसमें भी लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया के 34.4 प्रतिशत मरीज शामिल थे। वहीं हॉजकिन लिंफोमा से पीड़ित 12.9 प्रतिशत मरीज शामिल थे। इसके अलावा हड्डियों के ट्यूमर व आंखों के कैंसर रेटिनोब्लास्टोमाव से अधिक पीड़ित पाए गए।

89.9 फीसदी ने बीमारी रहित गुजारा जीवन

कैंसर पीड़ित इन बच्चों में पांच वर्ष जीवित रहने की कुल दर 94.5 प्रतिशत रही। कैंसर की बीमारी ठीक होने के बाद दोबारा होने की भी आंशका रहती है। अध्ययन में पाया गया कि इस पांच वर्ष के दौरान 89.9 प्रतिशत बच्चों ने बीमारी रहित जीवन गुजारी।

लड़कियों की तुलना में कैंसर पीड़ित लड़के दोगुने

अध्ययन में शामिल कैंसर पीड़ित बच्चों में 65.27 प्रतिशत लड़के और 33.44 प्रतिशत लड़कियां शामिल हैं। ऐसे में लड़कियों की तुलना में कैंसर पीड़ित लड़कों की संख्या दो गुनी पाई गई। यह आंकड़े बताते हैं कि लड़के कैंसर से अधिक पीड़ित होते हैं। हालांकि, अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाले लड़के व लड़कियों संख्या में बड़े अंतर को इलाज में लैंगिक असमानता से भी जोड़कर देखा जाता है। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. रचना सेठ ने कहा कि पहले यह माना जाता था कि लोग लड़कियों का इलाज कम कराते हैं लेकिन अब हम इस बात से सहमत नहीं है। यह देखा गया है कि कुछ कैंसर लड़कों में अधिक होता है। यह एक अहम कारण हो सकता है।

ज्यादातर मरीजों की कीमोथेरेपी से हुआ इलाज

अध्ययन में शामिल 67.34 प्रतिशत कैंसर पीड़ित बच्चे सरकारी अस्पतालों के और 32.66 प्रतिशत बच्चे निजी अस्पतालों के हैं। ज्यादातर बच्चों का इलाज कीमोथेरेपी से हुआ। यही वजह है कि अध्ययन में शामिल 94.7 प्रतिशत मरीजों को कीमोथेरेपी दी गई। 30.3 प्रतिशत मरीजों की सर्जरी व 26.3 प्रतिशत मरीजों की रेडियोथेरेपी हुई थी। ज्यादातर सर्जरी हड्डियों, आंखों व किडनी के कैंसर में पीड़ित बच्चों की हुई।

बच्चों में अधिक पाए गए ये से कैंसर

एक्युट ल्यूकेमिया- 40.9 प्रतिशत

लिंफोमा- 18.81 प्रतिशत

रेटिनोब्लास्टोमा- 7.4 प्रतिशत

हड्डियों का ट्यूमर- 8.4 प्रतिशत

किडनी का ट्यूमर- 4.61 प्रतिशत

शॉफ्ट टिश्यू व सारकोमा- 3.91 प्रतिशत

सीएनएस, इंट्राक्रेनियल व इंट्रास्पाइनल ट्यूमर- 3.80 प्रतिशत

उम्र वार मरीजों की संख्या

उम्र वर्ग- मरीजों की संख्या

2 वर्ष तक- 18.80

2.1-8- 44.53

8 वर्ष से अधिक- 32.46

उम्र पता नहीं- 3.21

अब 35 सेंटर जुड़े

डॉ. रचना सेठ ने कहा कि अध्ययन में पाया गया कि कैंसर पीड़ित ज्यादातर बच्चे ठीक हो जाते हैं और आगे लाइफ लंबी होती है। समय के साथ उनमें हृदय रोग, सामाजिक मानसिक परेशानी इत्यादि हो सकती है। इसलिए कैंसर को मात दे चुके बच्चों का डाटा तैयार कर रहे हैं। यही वजह है कि अब नेटवर्क से 35 अस्पताल जुड़ चुके हैं।

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