दिल्ली के शालीमार बाग गांव में बुलडोजर ऐक्शन का खौफ, लोगों ने खाली किए मकान
दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर शालीमार बाग में सड़क चौड़ीकरण के लिए 157 अवैध इमारतें हटाई जा रही हैं। इससे प्रभावित होकर करीब 6 हजार लोग अपने घरों को छोड़कर किराए पर रहने को मजबूर हैं।

दिल्ली के शालीमार बाग गांव में शनिवार को दिन भर अफरा तफरी का माहौल नजर आया। लोग अपने कीमती सामना और अन्य जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं को पैक करने के बाद ट्रकों, टैंपू में ले जाते हुए नजर आए। दिल्ली उच्च न्यायालय ने शालीमार बाग की सड़क चौड़ा करने के लिए संबंधित विभागों को 157 अवैध इमारतों को शनिवार को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। इसे लेकर शनिवार को सुबह से ही स्थानीय प्रशासन के अधिकारी, पुलिस के अधिकारी, सुरक्षा बल भारी संख्या में आना शुरू हो गए। पुलिस ने कानून व्यवस्था फ्लैग मार्च भी निकाला। इस दौरान कई लोग रोते-बिलखते हुए भी नजर आए। पीड़ित लोगों ने नम आंखों से अपने आशियाने को छोड़ा।
बुलडोजर ऐक्शन का खौफ
साथ ही, कई लोगों ने मकानों पर बने लोहे की वस्तुओं को हटाने के लिए घर के आगे के हिस्सों को तुड़वाया। पीड़ित करण सिंह ने कहा कि हमें शनिवार तक का ही समय दिया गया कि हम अपने सामान को निकालने के लिए दिया गया है। लेकिन हमारी अभी भी मांग है कि हमारे मकानों को ध्वस्त न किया जाए। कई पीड़ित लोगों ने आरोप लगाया कि हमें अब तक वैकल्पिक स्थान व मुआवजा नहीं मिला है। पीड़ित लोगों के अनुसार, रविवार को हमारे मकानों पर बुल्डोजर चल सकता है।
रेंट पर रहने को मजबूर हुए लोग
कई पीड़ित राम किशन ने कहा कि हम अपने परिवार के साथ 50 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं। हमारे पास मकानों के जायज दस्तावेज हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन हैं। वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक बने हुए हैं। जिन इमारतों को ध्वस्त किया जाना है, वहां पर छह सौ से अधिक परिवार और छह हजार लोग रहते हैं। पीड़ित लोगों ने कहा कि अब सभी पीड़ित लोग व परिवार रेंट पर रहने को मजबूर हो गए हैं। उनके पास कोई अन्य रहने का ठिकाना नहीं है। कई लोग मजदूरी करते हैं, रेहड़ी-पटरी लगाते हैं और मंडियों व अन्य जगहों पर नौकरी करके गुजर बसर करते हैं। उनके पास शालीमार बाग गांव के अलावा और कई मकान नहीं है।
मकानों को न तोड़े जाने की मांग दोहराई
पीड़ित लोगों ने कहा कि हमारी मांग है कि हम जहां रह रहे हैं, हमें वहीं पर रहने दिया जाए। हम जहां हैं जैसा है के आधार पर हमें रखा जाए, रहने दिया जाए। संविधान के अनुच्छेद 14 का पालन किया जाए। समानता के अधिकार के मद्देनजर इसके अनुपालन करते हुए का हमें किसी भी चीजों से वंचित न किया जाए। हमारे मकानों व घरों को न तोड़ा जाए। हमें जमीन के बदले जमीन या आज के बाजार के रेट के अनुसार मुआवजा प्रदान किया जाए।
जमीन के बदले जमीन व आज के रेट के अनुसार मुआवज मिले
पीड़ित स्थानीय लोगों ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी मांग है कि हम सभी पीड़ित 157 इमारतों में रहने वाले देश के नागरिकों को जमीन के बदले जमीन या आज के मौजूदा संपत्तियों के बाजार के रेट के अनुसार उचित मुआवजा प्रदान किया जाए। इसी के मद्देनजर किसी भी तरह की कोई भी कार्रवाई से पहले सरकार सभी पीड़ित परिवारों को मुआवजा तुरंत प्रदान करें या फिर हमारे मकानों को बख्श दिया जाए और उसे बिल्कुल भी न तोड़ा जाए।
'50 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं'
शालीमार बाग गांव के इन इमारतों में रहे रहे लोगों ने घर बचाओ आंदोलन शुरू किया है। इस संबंध में शालीमार बाग गांव के निवासी व घर बचाओ आंदोलन समिति के संयोजक मुकेश कुमार पासवान ने बताया कि हमने कई बार सरकार, स्थानीय प्रशासन से अपने मकानों बचाने के लिए गुहार लगाई। कई महिलाओं ने अपने मकान व घर को बचाने के लिए एक दिन की क्रमिक भूख हड़ताल शुरू की। यहां पर सभी परिवार 50 से 60 वर्षों से अधिक समय से रह रहे हैं। हमारे पास संपत्ति से जुड़े पावर ऑफ अटॉर्नी के पंजीकृत जायज दस्तावेज हैं। इन सब के बाद भी पीड़ित लोगों की कोई सुध नहीं ली जा रही है। यह प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से गलत है।
घर बचाने के लिए शुरू किया आंदोलन
मुकेश पासवान ने कहा कि लोगों के पास संपत्ति के जायज कागज हैं। उन्हें बिजली-पानी के कनेक्शन मिले हुए हैं। उनके आधार कार्ड, वोटर कार्ड बने हुए हैं। यहां पर निगम का एक प्राथमिक विद्यालय है। जिसमें लगभग दो हजार बच्चे पढ़ते हैं। इस स्कूल को भी मकानों के ध्वस्त करने के साथ शिफ्ट करने की बात की जा रही है। हमारे संविधान ने देश के नागरिकों को जीवन जीने का मौलिक अधिकार दिया है। इस अधिकार का हनन हो रहा है। वर्ष 1972 से यहां पर लोग रहना शुरू हुए। वर्ष 1978 में दिल्ली में आई बाढ़ के बाद यहां पर पानी ही पानी भर गया था। बाढ़ के बाद यहां की स्थिति को बेहद खराब थी। इसके बाद लोगों ने इसे ठीक कर सुधारा।
2010 में भी कार्रवाई को रोका गया
स्थानीय निवासियों ने बताया कि वर्ष 2010 में तत्कालीन राज्य सरकार ने हमारे मकानों को सड़क चौड़ा करने व इससे जुड़े मामलों को लेकर कार्रवाई करने की नीति अपनाई थी। लेकिन उस समय सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के बाद यह कार्रवाई पर रोक लगा दी गई थी। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि वर्ष 2010 में तत्कालीन उपराज्यपाल ने आदेश जारी किया था कि इस जगह पर बिना लोगों की अनुमति के मकानों व इमारतों पर किसी भी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।




साइन इन