You are expert in law, not religion why heated clash between Solicitor General and CJI lead bench in SC Shabrimala Case आप कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं? CJI की पीठ से केंद्र सरकार के वकील की तीखी भिड़ंत, क्या दलील?, India News in Hindi - Hindustan
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आप कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं? CJI की पीठ से केंद्र सरकार के वकील की तीखी भिड़ंत, क्या दलील?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास धार्मिक मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा कि माननीय न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं। 

Wed, 8 April 2026 04:38 PMPramod Praveen भाषा, नई दिल्ली
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आप कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं? CJI की पीठ से केंद्र सरकार के वकील की तीखी भिड़ंत, क्या दलील?

Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उसके पास यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है और उस पर आधारित है। अदालत ने यह टिप्पणी केंद्र सरकार की इस दलील के जवाब में की कि धर्म से जुड़े मामलों पर फैसला करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की संविधान पीठ केरल के शबरीमला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े कथित भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

सुनवाई की शुरुआत में केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल किया कि अदालत यह कैसे तय करेगी कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है। उन्होंने कहा, "मान लें कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है, तब भी यह तय करना अदालत का काम नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत यह काम विधायिका का है कि वह सुधार के लिए कानून बनाए।" मेहता ने आगे कहा कि संसद या राज्य विधानसभाएं किसी प्रथा को अंधविश्वास मानकर उसके खिलाफ कानून बना सकती हैं, जैसे काला जादू रोकने से जुड़े कानून।

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यह दलील बहुत सरल है

इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने कहा कि यह दलील बहुत सरल है, क्योंकि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं। उन्होंने कहा, "इसके बाद क्या कदम उठाना है, यह विधायिका देख सकती है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि जो विधायिका तय करे वही अंतिम होगा।" इसके बाद सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि उसके पास धार्मिक मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा, “माननीय न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं।”

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जादू-टोना अंधविश्वास माना जाएगा या नहीं?

मेहता ने कहा कि भारत जैसे विविध समाज में, एक प्रथा जो चीज धार्मिक है, वह दूसरी जगह अंधविश्वास मानी जा सकती है। इस दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि अगर जादू-टोना किसी धर्म का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? उन्होंने सवाल किया कि अगर इस मामले पर विधायिका चुप है, तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती? इस पर मेहता ने जवाब दिया कि अदालत समीक्षा कर सकती है, लेकिन यह 'अंधविश्वास' के आधार पर नहीं, बल्कि 'स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था' के आधार पर।

धर्म के दर्शन के नजरिए से देखना चाहिए

गरमागरम बहस के बीच जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को समझने के लिए उसी धर्म के दर्शन के नजरिए से देखना चाहिए। उन्होंने कहा, "किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह नहीं कहा जा सकता कि यह जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है। अदालत को उसी धर्म के सिद्धांतों के आधार पर फैसला करना चाहिए, लेकिन यह सब स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन होना चाहिए।" मामले पर सुनवाई जारी है।

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बता दें कि सितंबर 2018 में, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की दूसरी पीठ ने महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को 3:2 के बहुमत से बड़ी पीठ को भेज दिया था।