कुलदीप सेंगर मामले में SC में क्यों होने लगी लालकृष्ण आडवाणी की चर्चा? रेप केस में ये कैसा ट्विस्ट
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2017 के उन्नाव दुष्कर्म मामले में सेंगर की उम्रकैद की सजा को अपील लंबित रहने तक निलंबित करते हुए जमानत मंजूर की थी, जिस पर अब उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन बेंच ने उन्नाव रेप केस मामले में भाजपा के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दी गई थी। सोमवार (29 दिसंबर ) को जब सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली CBI की अर्जी पर सुनवाई हो रही थी, तो उसी दौरान भाजपा के वयोवृद्ध नेता और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से जुड़े एक मामले का जिक्र किया गया और इसी बहाने आडवाणी की चर्चा भी हुई।
दरअसल, सीबीआई ने सेंगर को मिली राहत के खिलाफ आडवाणी से जुड़े 1997 के एक पुराने कानूनी मामले का जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सांसद और विधायक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 'लोक सेवक' की श्रेणी में आते हैं।'लालकृष्ण आडवाणी बनाम सीबीआई' के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही सीबीआई ने सेंगर को मिली राहत के खिलाफ हथियार बनाया। सीबीआई के इस कदम और तर्क से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या चुने हुए विधायक को प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस (POCSO) एक्ट के तहत "सरकारी कर्मचारी" माना जा सकता है या नहीं?
CBI के क्या तर्क?
सीबीआई ने तर्क दिया कि अगर भ्रष्टाचार के मामले में विधायक लोक सेवक हैं, तो बच्चों के खिलाफ यौन अपराध (POCSO) जैसे गंभीर मामलों में उन्हें इस श्रेणी से बाहर कैसे रखा जा सकता है? इसके साथ ही एजेंसी ने चेतावनी दी कि अगर विधायकों को लोक सेवक नहीं माना गया, तो पॉक्सो एक्ट का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। अपनी याचिका में, CBI ने 'एलके आडवाणी बनाम CBI' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1997 के फैसले का हवाला दिया, जो आडवाणी सहित प्रमुख राजनीतिक हस्तियों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से उत्पन्न हुआ था। CBI ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामले दर्ज किए थे, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकारी फायदे के बदले राजनेताओं को अवैध फंड का भुगतान किया गया था।
उस मामले में एक केंद्रीय कानूनी मुद्दा यह था कि क्या चुने हुए प्रतिनिधियों यानी सांसदों और विधायकों को भ्रष्टाचार विरोधी कानून के उद्देश्यों के लिए "सरकारी कर्मचारी" माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उस सवाल का जवाब हां में दिया, यह मानते हुए कि चुने हुए जन प्रतिनिधि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सरकारी कर्मचारियों की श्रेणी में आते हैं।इसी को आधार बनाकर CBI ने अब तर्क दिया कि अगर विधायकों को भ्रष्टाचार जैसे अपराधों के लिए सरकारी कर्मचारी माना जा सकता है, तो बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में भी यही सिद्धांत समान या अधिक बल के साथ लागू होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
इस पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है। इसका मतलब है कि फिलहाल सेंगर को जेल में ही रहना होगा।

क्या है पूरा विवाद?
दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर को जमानत देते हुए तर्क दिया था कि पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत एक विधायक (MLA) को 'लोक सेवक' (Public Servant) नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट के अनुसार, चूंकि कानून में विधायकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इसलिए उन पर लोक सेवकों वाली सख्त शर्तें लागू नहीं होतीं। बता दें कि कुलदीप सेंगर को 2017 में एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म करने और उसके पिता की हिरासत में मौत के मामले में दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील की थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर को राहत देते हुए उस,के आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर दी थी और जमानत दे दी थी।




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