Why india lags in commercial shipbuilding but make nuclear powered submarines Explained परमाणु पनडुब्बी बना सकता है भारत, लेकिन कमर्शियल जहाज बनाने में क्यों फिसड्डी? 90 अरब की चपत, India News in Hindi - Hindustan
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परमाणु पनडुब्बी बना सकता है भारत, लेकिन कमर्शियल जहाज बनाने में क्यों फिसड्डी? 90 अरब की चपत

भारत 'आईएनएस अरिहंत' जैसी परमाणु पनडुब्बी बना सकता है, लेकिन कमर्शियल जहाज निर्माण में वैश्विक बाजार के 1% से भी पीछे क्यों है? जानिए शिपबिल्डिंग में चीन-कोरिया का दबदबा, भारत की चुनौतियां का पूरा अर्थशास्त्र।

Tue, 21 April 2026 01:41 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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परमाणु पनडुब्बी बना सकता है भारत, लेकिन कमर्शियल जहाज बनाने में क्यों फिसड्डी? 90 अरब की चपत

भारत दुनिया के उन कुछ गिने-चुने देशों में शामिल है, जिनके पास अपनी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी डिजाइन करने और बनाने की क्षमता है। भारत ने हाल ही में आईएनएस अरिदमन को कमीशन किया, जो देश की तीसरी स्वदेशी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) है। परमाणु पनडुब्बी बनाना दुनिया के सबसे जटिल इंजीनियरिंग कार्यों में से एक माना जाता है। लेकिन यह सवाल अक्सर उठता है कि जब हमारे पास इतनी उन्नत तकनीक है, तो हम विशालकाय कमर्शियल जहाज क्यों नहीं बना पाते? सुनने में यह विरोधाभासी लगता है, लेकिन इसके पीछे गहरी तकनीकी, आर्थिक और रणनीतिक वजहें हैं। आइए इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

वर्तमान स्थिति और आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार मुख्य रूप से समुद्री रास्तों से होता है, लेकिन इस व्यापार को ढोने वाले जहाज भारत के नहीं होते।

बाजार हिस्सेदारी: वैश्विक कमर्शियल जहाज निर्माण बाजार में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम है।

वैश्विक दबदबा: चीन और दक्षिण कोरिया मिलकर पूरी दुनिया के लगभग 80% जहाज निर्माण बाजार पर कब्जा जमाए हुए हैं।

भारतीय बेड़ा: ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास केवल 1,500 से अधिक जहाज हैं, जो वैश्विक बेड़े का मात्र 1.2% है।

आर्थिक नुकसान: क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, भारत हर साल माल ढुलाई पर लगभग 90 अरब रुपये खर्च करता है। चूंकि भारत के पास पर्याप्त जहाज नहीं हैं, इसलिए यह भारी-भरकम रकम विदेशी जहाजों और विदेशी कंपनियों की जेब में जाती है।

भारत युद्धपोत बना सकता है, तो कार्गो जहाज क्यों नहीं?

यह सवाल उठना लाजमी है कि जो देश 45,000 टन का जटिल विमानवाहक पोत बना सकता है, वह सामान्य कार्गो जहाजों के निर्माण में संघर्ष क्यों कर रहा है। इसका मुख्य कारण तकनीक की कमी नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र है।

रणनीतिक आवश्यकता बनाम व्यावसायिक मुनाफा: परमाणु पनडुब्बी एक राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकता है। इसमें सरकार का पूरा समर्थन होता है और बजट या समय की कोई सख्त पाबंदी नहीं होती। इसका उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है। वहीं, कमर्शियल जहाज पूरी तरह से मुनाफे, लागत-कुशलता और डिलीवरी के समय पर निर्भर करता है।

स्केल और स्पीड : एक शिपिंग कंपनी उसी से जहाज खरीदेगी जो सबसे सस्ता और सबसे जल्दी जहाज बनाकर देगा। दक्षिण कोरिया और चीन भारी मात्रा में एक साथ कई जहाज बनाते हैं, जिससे उनकी लागत कम हो जाती है। भारतीय शिपयार्ड इसमें मात खा जाते हैं।

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भारत कमर्शियल जहाज निर्माण में पीछे क्यों है?

भारतीय शिपबिल्डिंग उद्योग के न पनप पाने के पीछे कई ढांचागत और आर्थिक कारण हैं।

सप्लाई चेन और कलपुर्जों का अभाव: जहाज का बाहरी ढांचा बनाना आसान है, लेकिन एक जहाज के निर्माण में 65% लागत उसके उपकरणों (मरीन इंजन, प्रोपेलर, नेविगेशन सिस्टम) की होती है। भारत में इनका निर्माण न के बराबर होता है। भारत को ये सब यूरोप या एशिया के अन्य देशों से आयात करने पड़ते हैं, जिससे लागत काफी बढ़ जाती है।

पूंजी की उच्च लागत: जहाज निर्माण में भारी पूंजी की जरूरत होती है। भारत में बैंकों की ब्याज दरें चीन, जापान या दक्षिण कोरिया के मुकाबले काफी अधिक हैं। महंगे कर्ज के कारण भारतीय शिपयार्ड्स के लिए सस्ते जहाज बनाना मुश्किल हो जाता है। चीन और दक्षिण कोरिया में जहाज बनाने वालों को सरकार की ओर से 2-3% की बेहद कम ब्याज दर पर लोन मिल जाता है। जबकि भारत में शिपयार्ड्स को 10-12% की वाणिज्यिक दरों पर कर्ज लेना पड़ता है।

सरकारी सब्सिडी और नीतियां: चीन और दक्षिण कोरिया की सरकारों ने पिछले कई दशकों से अपने शिपयार्ड्स को भारी सब्सिडी, सस्ती बिजली, सस्ता स्टील और टैक्स छूट दी है। भारत में ऐसी आक्रामक औद्योगिक नीतियों का लंबे समय तक अभाव रहा है।

टैक्स और ड्यूटी: भारत में कच्चे माल के आयात पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी और अन्य करों के कारण भारतीय शिपयार्ड में बना जहाज विदेशी जहाजों की तुलना में 15% से 20% अधिक महंगा हो जाता है।

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90 अरब रुपये के नुकसान का प्रभाव

विदेशी जहाजों पर निर्भरता का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ढुलाई का जो 90 अरब रुपये का खर्च है, वह विदेशी मुद्रा के रूप में देश से बाहर चला जाता है। शिपबिल्डिंग एक लेबर-इंटेंसिव (श्रम-प्रधान) उद्योग है। अगर भारत में जहाज बनें, तो लाखों युवाओं को वेल्डिंग, डिजाइनिंग और फिटिंग जैसे कामों में सीधा रोजगार मिल सकता है। वैश्विक महामारी और युद्ध के समय विदेशी शिपिंग कंपनियां मनमाना किराया वसूलती हैं, जिससे देश में महंगाई बढ़ती है और सप्लाई चेन टूट जाती है।

भारत में कमर्शियल जहाज निर्माण का इतिहास

हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत पीछे है, लेकिन देश का कमर्शियल जहाज निर्माण का एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्र भारत का पहला आधुनिक स्टीमशिप, SS जल उषा, 1948 में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा लॉन्च किया गया था। 1980 के दशक में, कोचीन शिपयार्ड (CSL) ने भारत का पहला स्वदेशी तेल टैंकर, MV रानी पद्मिनी बनाया था। कोचीन शिपयार्ड ने हाल ही में फ्रांसीसी दिग्गज कंपनी CMA CGM के साथ 6 LNG-ईंधन वाले फीडर कंटेनर जहाजों के निर्माण का एक ऐतिहासिक कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है। इसके अलावा, मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) भी डेनिश कंपनियों के लिए मल्टी-परपज कार्गो जहाजों का निर्माण कर रहा है।

सरकार की नई नीतियां और पहल

आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा (डॉलर) के बाहर जाने से रोकने के लिए, भारत सरकार ने हाल ही में कई बड़े नीतिगत सुधार किए हैं। सितंबर 2025 में घोषित किए गए 69,725 करोड़ रुपये के शिपबिल्डिंग और समुद्री सुधार पैकेज में कई प्रमुख योजनाएं शामिल हैं।

समुद्री विकास कोष: निवेश और फाइनेंसिंग सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए 25,000 करोड़ रुपये का फंड।

जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना: वित्तीय सहायता और शिप-ब्रेकिंग क्रेडिट प्रोत्साहन के लिए 24,736 करोड़ रुपये का आवंटन।

जहाज निर्माण विकास योजना: बुनियादी ढांचे की क्षमता बढ़ाने और समुद्री क्लस्टर के विकास के लिए 19,989 करोड़ रुपये।

इन्फ्रास्ट्रक्चर का दर्जा: बड़े जहाजों के निर्माण को 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' (बुनियादी ढांचे) का दर्जा दिया गया है, ताकि उन्हें आसानी से और कम ब्याज पर फाइनेंसिंग मिल सके।

कुल मिलाकर भारत के पास बेहतरीन इंजीनियर और तकनीकी क्षमता है। अगर रक्षा क्षेत्र की तरह ही कमर्शियल शिपबिल्डिंग को भी सही नीतिगत समर्थन, सस्ता कर्ज और टैक्स में राहत मिले, तो भारत इस क्षेत्र में भी चीन और दक्षिण कोरिया को कड़ी टक्कर दे सकता है और हर साल देश से बाहर जाने वाले 90 अरब रुपये बचा सकता है।