ये जूडिशरी के लिए बोझ हैं... CJI ने किस पर निकाली भड़ास? अटॉर्नी जनरल से क्यों बोले- ये आपका सिरदर्द
CJI ने ट्रिब्यूनलों में चल रहे फंक्शनल क्राइसिस पर चिंता जताई और कहा कि ऐसी स्थिति राष्ट्रीय हित में नहीं है। TDSAT का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वहां अध्यक्ष की अनुपस्थिति में कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए।

देशभर के ट्रिब्यूनल्स के कामकाज के तौर-तरीकों पर घोर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी) को कहा कि ये संस्थाएं न्यायपालिका के लिए बोझ बन गई हैं और सरकार के लिए “सिरदर्द” बन गई हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की अध्यक्षता वाली पीठ ने ट्रिब्यूनलों की जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर ये कड़ी टिप्पणी की।
“नो-मैन्स लैंड बन गए हैं ट्रिब्यूनल”
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अधिकांश ट्रिब्यूनल “नो-मैन्स लैंड” बन चुके हैं, जहां किसी की जवाबदेही तय नहीं है। CJI सूर्यकांत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि चूंकि ट्रिब्यूनल केंद्र सरकार ने बनाए हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी सरकार की है। बेंच ने कहा कि यह देश के हित में नहीं है कि वे अभी पूरी तरह से गैर-जवाबदेह हैं। CJI कांत ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से कहा, “ट्रिब्यूनल आपने (केंद्र सरकार) बनाए थे। इसलिए यह आपका सिरदर्द है और हमारे लिए यह एक लायबिलिटी है क्योंकि अब हम जिस तरह के ऑर्डर देख रहे हैं, कुछ ट्रिब्यूनल को छोड़कर, ये ट्रिब्यूनल नो मैन्स लैंड बन गए हैं। वे किसी के प्रति अकाउंटेबल नहीं हैं।”
कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
अदालत ने ट्रिब्यूनलों में चल रहे “फंक्शनल क्राइसिस” पर चिंता जताई और कहा कि ऐसी स्थिति राष्ट्रीय हित में नहीं है। दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय न्यायाधिकरण (TDSAT) का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि वहां अध्यक्ष की अनुपस्थिति में कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही CJI ने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि एक ट्रिब्यूनल का तकनीकी सदस्य खुद निर्णय लिखने के बजाय उन्हें आउटसोर्स कर रहा है। इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि उचित समय पर उस सदस्य को पद से हटाया जा सकता है।
विशेषज्ञता और नियुक्ति प्रणाली पर सवाल
अदालत ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल सदस्यों में आवश्यक विशेषज्ञता की कमी है। चार साल के कार्यकाल में उनसे विशेषज्ञ बनने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। कोर्ट ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए एक नई और बेहतर प्रणाली की जरूरत है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ट्रिब्यूनल सुधारों को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है। नवंबर 2025 में, तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था और केंद्र सरकार को चार महीने के भीतर नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन बनाने का निर्देश दिया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल छोटे-छोटे सुधार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ट्रिब्यूनल प्रणाली में व्यापक और संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है ताकि पारदर्शिता, स्वतंत्रता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ट्रिब्यूनल व्यवस्था में गहरी खामियों की ओर इशारा करती है और संकेत देती है कि आने वाले समय में इस पूरे ढांचे में बड़े सुधार देखने को मिल सकते हैं।




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