नहीं करूंगा सुनवाई; कल कोई भी लगा सकता है आरोप, किस मामले में खुद को अलग कर बोले CJI
CJI ने कहा कि इस मामले की सुनवाई ऐसी पीठ द्वारा करना उपयुक्त होगा, जिसमें कोई भी जज चीफ जस्टिस बनने के क्रम में शामिल न हों। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने CJI के इस विचार का समर्थन किया।

CJI Suryakant News: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को उन याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति और सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाले कानून को चुनौती दी गई थी। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ को आज इस मामले की सुनवाई करनी थी, तभी CJI ने हितों के टकराव की बात उठाते हुए खुद को सुनवाई से अलग करने का फैसला किया।
बार एंड बेंच के मुताबिक, इस दौरान CJI ने टिप्पणी की, "क्या मुझे इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए? तल तो कोई भी मुझ पर हितों के टकराव (conflict of interest) का आरोप लगा सकता है।" इसके बाद उन्होंने इस मामले से खुद को अलग कर लिया। गौरतलब है कि जिस कानून को चुनौती दी गई है, उस पर इस आधार पर सवाल उठाए गए हैं कि यह चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए गठित पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखता है।
मामला क्या?
दरअसल यह पीठ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। मामले की सुनवाई इस आधार पर की जा रही है कि उक्त कानून ने प्रधान न्यायाधीश को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार चयन समिति से बाहर रखा है।
CJI का प्रशांत भूषण ने किया समर्थन
CJI कांत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई ऐसी पीठ द्वारा करना उपयुक्त होगा, जिसमें कोई भी न्यायाधीश प्रधान न्यायाधीश बनने के क्रम में शामिल न हों। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रधान न्यायाधीश के इस विचार का समर्थन किया। उन्होंने सुझाव दिया कि पक्षपात की आशंका से बचने के लिए इस मामले को किसी ऐसी पीठ के समक्ष रखा जाए, जिसके सदस्य कोई भावी प्रधान न्यायाधीश न हों।
कोई भावी प्रधान न्यायाधीश न करें सुनवाई
भूषण ने कहा, ''व्यक्तिगत रूप से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे किसी ऐसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सकता है जिसके सदस्य कोई भावी प्रधान न्यायाधीश न हों।'' सुझाव को स्वीकार करते हुए, प्रधान न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल के लिए एक अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और संकेत दिया कि नयी पीठ में ऐसे न्यायाधीश शामिल होंगे जो प्रधान न्यायाधीश का पद ग्रहण करने के क्रम में शामिल नहीं हैं।
SC ने क्या व्यवस्था दी थी?
दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित यह कानून, उच्चतम न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले के कुछ महीनों बाद आया, जिसमें शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति द्वारा की जाए। न्यायालय ने कहा था कि जब तक कोई नया कानून पारित नहीं हो जाता, यह व्यवस्था लागू रहेगी। इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है। मार्च 2023 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश की सदस्यता वाली एक समिति के परामर्श पर की जाएगी। (भाषा इनपुट्स के साथ)




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