नीतीश कुमार नहीं तो कौन? एक जवाब तलाशने में भाजपा के आगे ये 5 चैलेंज
नीतीश नहीं होंगे तो तय है कि भाजपा का ही सीएम बनेगा। लेकिन भाजपा के लिए खुद नीतीश कुमार का विकल्प दे पाना बहुत आसान नहीं होगा। यही वजह है कि अब तक कोई कयास लगाने तक की स्थिति में नहीं है कि कौन उनकी जगह ले सकता है। इसकी तलाश में भाजपा को 5 सवालों के जवाब भी खोजने होंगे।

नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर सीएम पद छोड़ने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। 10 अप्रैल से उनका राज्यसभा सांसद के तौर पर कार्यकाल शुरू होगा और तब तक उनके विकल्प के बारे में भाजपा और जेडीयू को मिलकर सोचना होगा। बिहार में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और नीतीश के लिए ही उसने त्याग किया था। ऐसे में अब जब नीतीश नहीं होंगे तो तय है कि भाजपा का ही सीएम बनेगा। लेकिन भाजपा के लिए खुद नीतीश कुमार का विकल्प दे पाना बहुत आसान नहीं होगा। यही वजह है कि अब तक कोई कयास लगाने तक की स्थिति में नहीं है कि कौन उनकी जगह ले सकता है। इसकी तलाश में भाजपा को 5 सवालों के जवाब भी खोजने होंगे।
नीतीश जैसे कद का नेता खोजना मुश्किल
भाजपा के लिए पहली मुश्किल यही है कि जिसे भी वह चुनेगी, पहले दिन से ही उसकी तुलना नीतीश कुमार से की जाएगी। नीतीश कुमार जेपी आंदोलन से निकले नेता रहे हैं और करीब 5 दशकों का राजनीतिक अनुभव रहा है। उनकी छवि बिहार की राजनीति में अजातशत्रु की रही है। सरकार की आलोचना करने वाले भी नीतीश कुमार का नाम लेने से परहेज करते रहे हैं। ऐसा उनका कद रहा है। आज जब तय हुआ कि वह सीएम नहीं रहेंगे तो उस दिन भी तेजस्वी यादव ने उनके अब तक के कार्यकाल के लिए धन्यवाद ही कहा है। इससे ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में वह नहीं थे।
सामाजिक समीकरणों का क्या होगा
बिहार सामाजिक समीकरणों के लिहाज से संवेदनशील सूबा है। नीतीश कुमार खुद अति पिछड़ा वर्ग के सूत्रधार थे। यादव गोलबंदी से इतर उन्होंने एक नया वोटर वर्ग तैयार किया था। ऐसे में नया चेहरा चुनते हुए भाजपा को ध्यान रखना होगा कि एनडीए के पक्ष में जो अति पिछड़ा की गोलबंदी है, उस पर कोई प्रभाव ना पड़े। यही कारण है कि तमाम नेताओं के नाम चल रहे हैं, लेकिन आखिर में किसी का नाम तय नहीं माना जा रहा। वजह यही कि सभी को सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी तौला जा रहा है।
सबको साथ लेकर चलने की कला में माहिर
सबका साथ, सबका विकास। यह एक राजनीतिक नारा भले है, लेकिन राजनीति में इसकी व्यवहारिकता बहुत है। नीतीश कुमार ऐसे नेता रहे हैं, जिनके शासनकाल में सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश हुई है। अब नया चेहरा जो आएगा, उसे इस कसौटी पर भी कसा जाएगा।
महिला सुरक्षा और शराबबंदी
2005 के बाद ही ना सब हुआ? नीतीश कुमार अकसर रैलियों में यह बात कहते थे। उनका यह जुमला हर बार सुना जाता था और कई बार लोग इस पर तंज भी कसते थे। लेकिन यह हकीकत है कि 2005 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जो बदलाव किए, वे अहम रहे। महिलाओं की सुरक्षा की बात हो या फिर शराबबंदी के जरिए सख्ती दिखाने की, वह कभी पीछे नहीं हटे। महिला सुरक्षा बिहार में एक अहम मसला रहा है। इन मोर्चों पर भी नए चेहरे की परीक्षा ली जाएगी।
करिश्माई चेहरे की तलाश होगी पूरी?
अंतिम बात यह कि कोई भी सरकार करिश्माई नेता के सहारे ही चलती है। यह मैनेजमेंट का नहीं बल्कि करिश्मे का खेल है। नीतीश कुमार ने इसी करिश्मे के सहारे इतना लंबा वक्त खींचा। उनके स्वास्थ्य को लेकर लगातार सवाल उठते रहे, लेकिन उनका करिश्मा ही था कि कोई खुलकर उन पर कुछ भी नहीं बोलता था। अब ऐसे किसी करिश्माई नेता की तलाश बिहार को होगी। फिलहाल देखना होगा कि उनकी जगह कौन और कैसे ले पाता है।




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