भारत को आंख दिखाने की कोशिश कर रहा है बांग्लादेश? क्या है गंगा वाले बांध का प्लान
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद और मालदा जिले में है। राजधानी कोलकाता से इसकी दूरी करीब 300 किमी है। फरक्का बैराज प्रोजेक्ट भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर हुए समझौते को लागू करने के लिहाज से अहम माना जाता है।

ECNEC यानी बांग्लादेश की राष्ट्रीय आर्थिक परिषद कार्यकारी समिति ने पद्मा बैराज प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। कहा जा रहा है कि बांग्लादेश ने यह कदम भारत के फरक्का बैराज से होने वाले प्रभाव से निपटने के लिए इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। अब तक भारत ने इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, बांग्लादेश का कहना है कि यह आंतरिक मामला है और चर्चा की कोई जरूरत नहीं है। हालांकि, इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। समझते हैं कि आखिर यह प्रोजेक्ट क्या है।
क्या है पद्मा बैराज प्रोजेक्ट
ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, इस योजना का मकसद हिस्ना-माथाभांगा, गराई मधुमती, चंदना बरशिया, बराल और इछामती जैसी बड़ी नदियों को फिर से जिंदा करना है। पिछले कई सालों से इन नदियों की हालत बहुत बिगड़ गई है और इसलिए इस प्रोजेक्ट के जरिए इनमें पानी का बहाव वापस लाया जाएगा। ताकि नावें और जहाज फिर से आसानी से चल सकें।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों का कहना है कि इस योजना का एक बड़ा मकसद सतखीरा, खुलना और बागेरहाट जैसे दक्षिण पश्चिमी जिलों में समुद्र के खारे पानी को आने से रोकना है। इससे सुंदरबन इलाके को मीठा पानी मिल सकेगा। साथ ही इससे जैसोर के भबोदह जैसे इलाकों में जमा होने वाले पानी की समस्या दूर होगी और निकासी का सिस्टम बेहतर होगा। इसके अलावा जमीन के नीचे पानी का स्तर बढ़ेगा और पानी में मौजूद जहरीले आर्सेनिक की मात्रा भी कम होगी।
ऐसा होगा प्रोजेक्ट
इस प्रोजेक्ट के तहत 2.1 किमी का मुख्य पद्मा बैराज तैयार होगा, जिसके साथ अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर भी मौजूद होगा। इस प्रोजेक्ट में 34,497.25 करोड़ टका खर्च होने का अनुमान है।
भारत का फरक्का प्रोजेक्ट
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद और मालदा जिले में है। राजधानी कोलकाता से इसकी दूरी करीब 300 किमी है। फरक्का बैराज प्रोजेक्ट भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर हुए समझौते को लागू करने के लिहाज से अहम माना जाता है।
यह प्रोजेक्ट मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में गंगा और पद्मा नदी के कटाव को रोकने का काम भी करता है, ताकि वहां रहने वाले लोगों, उनकी जमीन और सड़कों और पुलों जैसी सरकारी संपत्तियों को बचाया जा सके। इसके अलावा 1996 के समझौते के तहत सूखे के दिनों में बांग्लादेश को गंगा का पानी देना भी इसी का हिस्सा है। पीटीआई भाषा के अनुसार, बांग्लादेश का कहना है कि इससे भारत के फरक्का बांध के 'नकारात्मक प्रभाव' को कम करने में मदद मिलेगी।
खास बात है कि भारत में पद्मा नंदी को गंगा कहते हैं। वहीं, बांग्लादेश ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी ऐसे समय पर दी है, जब दोनों मुल्कों के बीच हुई गंगा जल बंटवारा संधि दिसंबर में खत्म हो रही है। यह संधि साल 1996 में हुई थी।
भारत ने 1975 में इस बैराज को बनाया था। इसका बड़ा मकसद गंगा नदी के पानी को हुगली नदी की तरफ मोड़ना था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि हुगली नदी में जमी मिट्टी और गंदगी साफ हो सके और कोलकाता बंदरगाह तक जहाजों का आना जाना आसान बना रहे। भारत का हमेशा से यही कहना है कि इस बैराज को केवल कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बनाया गया था।
बांग्लादेश क्या बोला
जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने पत्रकारों को बताया कि इस परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य बांग्लादेश की ओर पानी का भंडारण कर गंगा पर फरक्का बैराज के प्रभाव को कम करना है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 नदियों से जुड़े मुद्दों का इस परियोजना से संबंध नहीं है। बांग्लादेश के मंत्री ने कहा, 'पद्मा बांध बांग्लादेश के अपने हित का मामला है और इस मुद्दे पर भारत से किसी भी प्रकार की चर्चा की आवश्यकता नहीं है।' हालांकि, अनी ने कहा कि गंगा के जल को लेकर भारत के साथ बातचीत जारी है। उन्होंने कहा, 'गंगा के संबंध में चर्चा आवश्यक है और वह जारी है।'




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