भारत की सीमा पर चीन को लाना चाहता है बांग्लादेश? 'चिकन नेक' के पास खतरनाक प्लान
बांग्लादेश ने तीस्ता नदी परियोजना के लिए चीन से मदद मांगी है। भारत के बेहद संवेदनशील 'चिकन नेक' के पास चीन की मौजूदगी से राष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। जानें क्या है ढाका और बीजिंग का ये पूरा प्लान।
बांग्लादेश ने बुधवार को 2.8 अरब डॉलर की एक मेगा नदी परियोजना को मंजूरी दे दी है। अधिकारियों को उम्मीद है कि इस ऐतिहासिक कदम से देश के गंभीर जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी। बांग्लादेश अपने जल संकट के लिए अक्सर भारत को जिम्मेदार ठहराता रहा है। इस अहम योजना का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की पद्मा नदी पर 2.1 किलोमीटर लंबा बैराज बनाना है। इस बैराज की जलभंडारण क्षमता काफी विशाल होगी, जिससे इसमें 2.9 अरब घन मीटर तक पानी जमा किया जा सकेगा। बता दें कि पद्मा नदी बांग्लादेश की प्रमुख नदी है, जो गंगा नदी का ही विस्तार है। यानी बांग्लादेश में भारत की गंगा नदी को पद्मा नदी कहा जाता है। यहां दिलचस्प बात ये है कि बांग्लादेश पिछले कुछ समय से नदियों के पानी को लेकर सक्रिय कदम उठा रहा है। यहां तक कि उसने चीन से सीधे मदद मांगी है।
दरअसल हाल ही में बांग्लादेश में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार ने तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना (TRCMRP) के लिए चीन से औपचारिक रूप से सहयोग और आर्थिक मदद मांगी थी। यह कदम भारत की सुरक्षा और भू-राजनीतिक चिंताओं को बढ़ा रहा है क्योंकि यह परियोजना भारत के बेहद संवेदनशील 'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) के बिल्कुल करीब है।
ढाका का बीजिंग की ओर झुकाव
फरवरी 2026 में हुए आम चुनावों में जीत के बाद, तारिक रहमान बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बने हैं। मई 2026 के पहले हफ्ते में, बांग्लादेश के नवनियुक्त विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान ने बीजिंग का दौरा किया और चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की।
इस द्विपक्षीय बैठक के दौरान, बांग्लादेश ने औपचारिक रूप से 1 अरब डॉलर की लागत वाली 'तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट' को लागू करने के लिए चीन से तकनीकी और वित्तीय सहयोग की मांग की।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया और तारिक रहमान प्रशासन को अपना पूरा समर्थन देने का वादा किया। चीन ने कहा कि वह बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत बांग्लादेश की राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के साथ सहयोग बढ़ाने को तैयार है। साथ ही, चीन ने स्पष्ट किया कि उसके दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंध किसी 'तीसरे देश' (परोक्ष रूप से भारत) के खिलाफ नहीं हैं।
'चिकन नेक' (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) से जुड़ी भारत की सुरक्षा चिंताएं
पश्चिम बंगाल में स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे 'चिकन नेक' भी कहा जाता है), मात्र 20-22 किलोमीटर चौड़ा और 60 किलोमीटर लंबा एक संकरा भू-भाग है। यह कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को उसके आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। इस इलाके से ही अहम हाईवे, रेलवे लाइनें और ऊर्जा पाइपलाइनें गुजरती हैं।
तीस्ता नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से बहते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यह चीनी परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर से बमुश्किल 100-130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होगी।
खुफिया और सैन्य खतरा
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और रक्षा विशेषज्ञों को डर है कि अगर चीन इस परियोजना के बहाने इस इलाके में बांध, रिजर्वयर या अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाता है, तो वह वहां अपनी तकनीकी और मानवीय उपस्थिति दर्ज कराएगा। इससे चीन को सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर खुफिया निगरानी करने और भविष्य में किसी युद्ध की स्थिति में इस अहम 'चोकपॉइंट' पर दबाव बनाने का मौका मिल सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, चीन की मदद से उत्तरी बांग्लादेश में 'लालमोनिरहाट' में एक पुराना एयरबेस भी विकसित किए जाने की चर्चा है, जो सिलीगुड़ी कॉरिडोर से मात्र 135 किमी दूर है। अगर यह एयरबेस ड्रोन या सर्विलांस विमानों के लिए इस्तेमाल होता है, तो भारत के लिए यह एक गंभीर सैन्य खतरा होगा।
तीस्ता नदी परियोजना (TRCMRP) में क्या-क्या शामिल है?
- इस विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का उद्देश्य सूखे के मौसम में बांग्लादेश के रंगपुर क्षेत्र में पानी की कमी और मॉनसून में बाढ़ की समस्या को दूर करना है।
- नदी की चौड़ाई को कम करके 1 किलोमीटर तक सीमित करना और गहराई बढ़ाकर 10 मीटर तक करना ताकि पानी स्टोर किया जा सके।
- नदी के दोनों किनारों पर तटबंध बनाना।
- तटीय इलाकों में 170 वर्ग किलोमीटर भूमि को रिक्लेम करके वहां कृषि क्षेत्र, इंडस्ट्रियल पार्क और सोलर पार्क विकसित करना।
यह पूरी परियोजना चीनी तकनीक (PowerChina जैसी कंपनियों के माध्यम से) और चीनी फंडिंग से पूरी होने की उम्मीद है।
भारत का रुख और जल-बंटवारा विवाद
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर 2011 से ही समझौता अटका हुआ है, जिसका मुख्य कारण पश्चिम बंगाल सरकार का विरोध है। पानी की कमी के चलते ही बांग्लादेश ने परेशान होकर चीन का रुख किया है।
चीन की बढ़ती दखलंदाजी को देखते हुए, भारत ने 2024 में बांग्लादेश को तीस्ता बेसिन के संरक्षण के लिए अपनी ओर से तकनीकी सहायता का प्रस्ताव दिया था, लेकिन नई बांग्लादेशी सरकार ने चीनी प्रस्ताव को तरजीह दी है।
1996 में हुई भारत-बांग्लादेश 'गंगा जल संधि' दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। ऐसे समय में जब दोनों देशों को एक नई संधि पर बातचीत करनी है, बांग्लादेश का तीस्ता के मुद्दे पर चीन को लाना भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए है।
भारत के फरक्का बैराज से जुड़ा विवाद
दशकों से नई दिल्ली और ढाका के बीच नदियों के जल बंटवारे को लेकर विवाद रहा है। यह नया प्रोजेक्ट भारत के फरक्का बैराज के कारण सूखे के मौसम में होने वाली पानी की कमी को दूर करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। 1970 में निर्मित फरक्का बैराज, सूखे के मौसम में गंगा से बड़ी मात्रा में पानी को डायवर्ट करता है। दूसरी ओर, भारत लंबे समय से फरक्का बैराज का बचाव करता आया है। उसका तर्क है कि ढाका ने अपने स्वयं के जल संसाधनों का कुशलता से उपयोग नहीं किया है।
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