West Bengal Election Know the strengths and weaknesses of TMC BJP CPI and Congress टीएमसी, भाजपा, माकपा, कांग्रेस की ताकत और कमजोरियां; बंगाल जीतना ममता के लिए अबकी बार कितना मुश्किल, India News in Hindi - Hindustan
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टीएमसी, भाजपा, माकपा, कांग्रेस की ताकत और कमजोरियां; बंगाल जीतना ममता के लिए अबकी बार कितना मुश्किल

पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद टीएमसी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है। कई जिलों में स्थानीय प्रशासन से असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और नेताओं के प्रति नाराजगी उभरकर सामने आई है। पार्टी के भीतर गुटबाजी एक और चुनौती बनी हुई है। 

Sun, 15 March 2026 07:29 PMNiteesh Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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टीएमसी, भाजपा, माकपा, कांग्रेस की ताकत और कमजोरियां; बंगाल जीतना ममता के लिए अबकी बार कितना मुश्किल

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई है। निर्वाचन आयोग ने रविवार को बताया कि राज्य में दो चरण में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। चुनाव तारीखों के ऐलान के साथ ही राज्य में सत्तारूढ़ टीएमसी और विपक्षी भाजपा समेत विभिन्न राजनीतिक दलों की ताकत और कमजोरी पर चर्चा शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी बीते एक दशक से अधिक समय से राज्य में मजबूत जनाधार और सत्ता बरकरार रखे हुए है। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत बनर्जी की प्रभावशाली छवि बनी हुई है, जिनका जनाधार और जूझारु रवैया अब भी बंगाल की राजनीति में विपक्षी दलों पर भारी है। बीते वर्षों में उन्होंने खुद को राज्य स्तर पर एक कद्दावर नेता और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की आवाज के रूप में स्थापित किया है।

पार्टी की एक और ताकत इसका मजबूत संगठनात्मक ढांचा है, जो राज्य नेतृत्व से लेकर गांवों और शहरों में बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं तक फैला हुआ है। पंचायत निकायों, नगरपालिका बोर्ड और स्थानीय समितियों के माध्यम से इस नेटवर्क को मजबूती मिली है। इसके अलावा इस नेटवर्क के जरिये पार्टी को मतदाताओं को प्रभावी ढंग से संगठित और सक्रिय रखने में मदद मिली है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान, टीएमसी ने स्थानीय स्तर पर अपनी मशीनरी को सक्रिय किया ताकि इस प्रक्रिया की निगरानी करके यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसका जनाधार अटूट बना रहे। इसके अलावा पार्टी ने लक्ष्मी बंधन, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं के जरिये महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अपने साथ जोड़े रखा है। हालांकि, टीएमसी की कुछ कमजोरियां भी हैं।

TMC के सामने चुनौती

पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद टीएमसी सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है। कई जिलों में स्थानीय प्रशासन से असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोप और नेताओं के प्रति नाराजगी उभरकर सामने आई है। पार्टी के भीतर गुटबाजी एक और चुनौती बनी हुई है। जिला स्तरीय नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक प्रभाव के लिए होड़ कभी-कभी सार्वजनिक झगड़ों का कारण बन चुकी है, विशेषकर स्थानीय चुनावों के दौरान। ऐसी तनावपूर्ण स्थितियां संगठनात्मक एकजुटता को कमजोर कर सकती हैं, जब पार्टी को एसआईआर प्रक्रिया के राजनीतिक निहितार्थों का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।

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दूसरी ओर विपक्षी दल भाजपा भी इस बार जोर-शोर से चुनावी मैदान में उतरी है। हालांकि उसकी भी कुछ ताकत और कुछ कमजोरियां हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आलाकमान के प्रभावशाली नेतृत्व से आस लगाए हुए है। पार्टी ने हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण के माध्यम से अपनी पकड़ बनाई है, साथ ही भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित किया है। पिछले एक दशक के बंगाल के चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि भाजपा ने पारंपरिक वाम और कांग्रेस के मतदाताओं को आकर्षित कर राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खुद को स्थापित किया है।

BJP लगा रही जोर

भाजपा ने साल 2001 के चुनाव में केवल पांच प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 2016 में 291 में से केवल तीन सीट जीती थीं। अब पार्टी का मत प्रतिशत 39 प्रतिशत से अधिक है। पार्टी के 12 सांसद और 65 से अधिक विधायक हैं। दूसरी ओर पार्टी की कुछ कमजोरियां भी हैं। यह विडंबना ही लगती है कि राष्ट्रीय स्तर पर करिश्माई नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी को टीएमसी के सामने करारी हार का सामना करना पड़ा है। विश्लेषकों के अनुसार, टीएमसी की भाजपा को बाहरी बताने की मुहिम काफी कारगर रही है जिससे भाजपा को नुकसान हुआ है।

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विश्लेषकों के अनुसार वास्तव में कथित 'उत्तर भारतीय मॉडल' पर भाजपा की अत्यधिक निर्भरता अक्सर पार्टी की संभावनाओं के खिलाफ काम करती है। इसके अलावा कई लोगों के अनुसार, एसआईआर पर भाजपा के अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूह पार्टी से दूरी बना सकते हैं। भाजपा की बंगाल इकाई में गहरी आंतरिक गुटबाजी के बार-बार सामने आने से पिछले चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा है। वहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पश्चिम बंगाल में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उसकी उम्मीदें 2021 के राज्य विधानसभा चुनावों की तुलना में 2024 के लोकसभा चुनावों में वोट शेयर में थोड़ी बढ़त हासिल करने पर टिकी हैं।

राज्य भर में 20 दिनों तक चली 'बांग्ला बचाओ यात्रा' के दौरान मिली "अच्छी प्रतिक्रिया" से उत्साहित माकपा बढ़-चढ़कर सत्तारूढ़ टीएमसी पर भ्रष्टाचार और धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देने का आरोप लगा रही है। माकपा को अपने नेताओं की स्वच्छ छवि और साधारण जीवनशैली पर गर्व है।पार्टी राज्य में कुछ बड़े मुद्दों, जैसे स्कूल नौकरी घोटाला और आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक से बलात्कार और हत्या के खिलाफ आंदोलन चला चुकी है। हालांकि, पार्टी की कुछ कमजोरियां भी हैं।

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आंदोलनों और प्रदर्शनों से माकपा को 2021 के विधानसभा चुनावों और 2019 एवं 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई खास चुनावी लाभ नहीं हुआ। 2011 में सत्ता में रहते हुए वाम मोर्चे को 39 प्रतिशत वोट मिले थे, जिसमें से 30 प्रतिशत वोट अकेले माकपा ने हासिल किए थे। जबकि एक दशक बाद 2021 के विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चा का वोट प्रतिशत केवल 4.73 प्रतिशत रह गया। घटते जनाधार और नेताओं का उम्रदराज होना वाम मोर्चा के लिए बड़ी बाधाएं प्रतीत होती हैं, जिसने 2011 तक राज्य में 34 वर्ष तक शासन किया था। साल 1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल पर लगातार शासन करने के बावजूद, वाम मोर्चा पिछले दशक में राजनीतिक हाशिए पर पहुंच गया है।

कांग्रेस का क्या हाल

इस बीच, कांग्रेस ने अपनी प्रासंगिकता बहाल करने के लिए इस बार अपने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पार्टी ने माकपा तथा वाम मोर्चे के अन्य सहयोगियों के साथ लंबे समय से चले आ रहे गठबंधन को खत्म कर दिया है। 2021 के चुनावों में सफलता न मिलने के बावजूद, उत्तर और मध्य बंगाल के कुछ हिस्सों विशेष रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में कांग्रेस का प्रभाव बरकरार है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों में कांग्रेस ने ढंग से चुनाव प्रचार किया, तो ये धीरे-धीरे पार्टी के पुनरुत्थान के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

पार्टी की एक और ताकत उम्मीदवारों को आकर्षित करने की इसकी क्षमता है। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने कहा है कि आगामी चुनाव के लिए पार्टी को टिकट के लिए सैंकड़ों आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि पिछले चुनावों में झटके मिलने के बावजूद लोग पार्टी से उम्मीद लगाए हुए हैं। हालांकि, पार्टी की कुछ कमजोरियां भी हैं।1970 के दशक के अंत में वाम मोर्चा के उदय से पहले दशकों तक पश्चिम बंगाल पर शासन करने वाली कांग्रेस राज्य में पुनः मजबूत पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। संगठनात्मक पतन, दलबदल और सीमित संसाधनों ने कई जिलों में पार्टी की मौजूदगी को कमजोर कर दिया है।विश्लेषकों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दशकों तक सीमित उपस्थिति और घटते स्थानीय जनाधार के कारण पार्टी की राजनीतिक प्रासंगिकता बहुत कमजोर हो गई है।