बंगाल में ममता बनर्जी के हारते ही टूटने लगी TMC! 80 में सिर्फ 35 विधायक ही पहुंचे, बाकी नहीं आए
ममता बनर्जी के 80 विधायकों में से केवल 35 ही इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित दरारों को लेकर अटकलें तेज हो गईं, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी चुनावी झटके के बाद खुद को फिर से संगठित करने के लिए संघर्ष कर रही है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में हार के बाद, ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में बड़ी फूट और टूट की आशंका जताई जा रही है। बुधवार को पार्टी के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम से कई टीएमसी विधायकों की गैरमौजूदगी ने नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है। टीएमसी विधायकों के एक गुट ने विधानसभा परिसर में अंबेडकर प्रतिमा के पास चुनाव के बाद की हिंसा और फेरीवालों को हटाने के अभियानों के खिलाफ धरना दिया। सत्ता में 15 साल बिताने के बाद विपक्ष की बेंचों पर धकेले जाने के बाद, यह पार्टी का पहला समन्वित आंदोलन था। इस मौके पर मौजूद लोगों में शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बनर्जी, कुणाल घोष और ऋतब्रत बनर्जी शामिल थे।
हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही इस कार्यक्रम में शामिल हुए। इससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित दरारों को लेकर अटकलें तेज हो गईं, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी चुनावी झटके के बाद खुद को फिर से संगठित करने के लिए संघर्ष कर रही है। टीएमसी के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की बातों को खारिज कर दिया। उन्होंने विधायकों की गैरमौजूदगी का कारण लॉजिस्टिक से जुड़ी दिक्कतें और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को बताया।
उन्होंने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया, "आज कार्यक्रम में लगभग 35 विधायक मौजूद थे। चूंकि विधायक चुनाव के बाद हुई हिंसा से प्रभावित कई इलाकों में कार्यकर्ताओं के साथ व्यस्त हैं, इसलिए कई लोग नहीं आ पाए। और फिर, यह कार्यक्रम सिर्फ एक दिन के नोटिस पर आयोजित किया गया था, इसलिए दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले विधायकों के लिए इसमें शामिल होना मुश्किल था।'' हालांकि, इस घटनाक्रम का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि यह विरोध प्रदर्शन कालीघाट में हुई एक अहम बैठक के ठीक एक दिन बाद हुआ। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उस बैठक में कई विधायकों ने यह तर्क दिया था कि TMC सिर्फ रणनीतिक सत्रों के जरिए खुद को पुनर्जीवित नहीं कर सकती, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर लोगों को लामबंद करके उनसे फिर से जुड़ने की जरूरत है।
पार्टी सूत्रों ने बताया कि मंगलवार को हुई बैठक में, जिसमें पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी शामिल थे, कुछ विधायकों ने चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी नेतृत्व की 'सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन' करने में कथित अनुपस्थिति को लेकर चिंता जाहिर की। खबरों के अनुसार, कई विधायकों ने यह बात साफ तौर पर कही कि बंद कमरों के भीतर बैठकें करने से उस पार्टी को कोई मदद नहीं मिलेगी जो अपना खोया हुआ राजनीतिक जनाधार वापस पाने की कोशिश कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, कालीघाट में हुई चर्चाओं में पार्टी के कुछ वर्गों के बीच नेतृत्व के चुनाव के बाद के राजनीतिक रवैये को लेकर एक बड़ी चिंता भी झलक रही थी। इस पृष्ठभूमि में, बुधवार का विरोध प्रदर्शन चुनाव के बाद की हिंसा और अतिक्रमण विरोधी अभियानों के मुद्दों से कहीं ज्यादा प्रतीकात्मक था। टीएमसी विधायकों ने विधानसभा में बीआर अंबेडकर की प्रतिमा के पास बेदखली, इमारतों को गिराने के लिए बुलडोजर के इस्तेमाल और चुनाव के बाद कथित हिंसा के विरोध में धरना दिया।
क्या कह रहे जानकार?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नेतृत्व में बदलाव के बाद टीएमसी विधायकों के पहले बड़े विरोध प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति ने स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पार्टी एक लंबे समय से सत्ता में काबिज ताकत से एक विपक्षी दल के रूप में कितनी प्रभावी ढंग से बदलाव कर पाएगी। उन्होंने कहा कि मुद्दा केवल संख्या का ही नहीं हो सकता, बल्कि उस संदेश का है जो ऐसी तस्वीरें ऐसे समय में देती हैं, जब पार्टी एक अभूतपूर्व झटके के बाद अपने सांगठनिक आत्मविश्वास को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है।




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