अमीरों को ऐसी सजा नहीं देते, दलितों से थाना साफ कराया...भड़के CJI सूर्यकांत; सभी फैसले रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा अदालतों के उन आदेशों को रद्द कर दिया है जिनमें दलितों और आदिवासियों को जमानत के बदले पुलिस स्टेशन साफ करने की शर्त रखी गई थी। CJI ने इसे न्यायपालिका की जातिवादी सोच और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन बताया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाईकोर्ट समेत ओडिशा की विभिन्न अदालतों द्वारा पारित उन आदेशों पर कड़ी नाराजगी जताई है जिनमें आरोपियों को जमानत देने के एवज में 'पुलिस स्टेशनों की सफाई' करने की शर्त रखी गई थी। इन आरोपियों में मुख्य रूप से दलित और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने ऐसे सभी आदेश रद्द कर दिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन शर्तों को मानवाधिकारों का उल्लंघन और व्यक्ति की गरिमा पर सीधा प्रहार बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में आई कई मीडिया रिपोर्टों में खुलासा हुआ था कि ओडिशा की कई अदालतें और स्वयं ओडिशा हाईकोर्ट जमानत देते समय अजीबोगरीब शर्तें लगा रहे हैं। पिछले 6 महीनों में ओडिशा हाईकोर्ट ने ही लगभग 50 ऐसे आदेश पारित किए थे। इनमें से ज्यादातर मामले उन दलितों और आदिवासियों से जुड़े थे, जो राज्य में खनन-विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे। उदाहरण के तौर पर, लक्ष्मण नायक मामले और अन्य मामलों में आरोपियों को जमानत के लिए 2 महीने तक पुलिस स्टेशन साफ करने जैसी अभूतपूर्व शर्तें लगाई गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने इस स्थिति पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए ओडिशा न्यायपालिका के रवैये को आड़े हाथों लिया। जातिगत भेदभाव पर कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों के खिलाफ न्यायपालिका के भीतर छिपे जातिगत पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं।
अमीरों के लिए ऐसी शर्तें नहीं
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि साधन संपन्न और अमीर लोगों को जमानत देते समय कभी ऐसी शर्तें नहीं लगाई जाती हैं। यह शर्त इतनी क्रूर और घृणित है कि यह ओडिशा न्यायपालिका को 'जाति-आधारित' साबित कर सकती है।
सीजेआई ने याद दिलाया कि हमारे संविधान ने लोगों को जो सबसे अनमोल उपहार दिया है, वह है 'जातिविहीन समाज' और 'समानता'। न्यायपालिका से इन अधिकारों की रक्षा की उम्मीद की जाती है।
न्यायपालिका की छवि खराब
सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि 2026 में न्यायपालिका से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं की जाती। उन्होंने कहा- हमने स्वतंत्रता के 76 साल बिताए हैं और हम इस तरह से उसका कर्ज चुका रहे हैं। ऐसे आदेश न्यायपालिका की छवि को खराब कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए की महत्वपूर्ण फैसले सुनाए।
शर्तें शून्य और अमान्य: ओडिशा की अदालतों द्वारा लगाई गई थाना साफ करने या इसके जैसी अन्य सभी शर्तों को तत्काल प्रभाव से शून्य और अमान्य घोषित कर दिया गया है।
हाईकोर्ट जाने की छूट: जिन आरोपियों पर ये शर्तें लगाई गई थीं, उन्हें ओडिशा हाईकोर्ट जाकर इन शर्तों को हटवाने की छूट दी गई है।
शर्तें बदलने पर रोक: सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट इन शर्तों को हटाते समय इसके बदले कोई अन्य ऐसी ही अजीब शर्त नहीं जोड़ेगा और आरोपी जमानत पर बाहर ही रहेंगे।
देशभर के जजों के लिए चेतावनी
पीठ ने देश की अन्य सभी राज्य न्यायपालिकाओं और न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे भविष्य में जातिगत रंगत वाली ऐसी कोई शर्त न थोपें जिससे समाज में घर्षण पैदा हो। इस आदेश की प्रति देशभर के न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
संक्षेप में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका का काम नागरिकों के मौलिक अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना है, न कि अपने आदेशों के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों को प्रताड़ित करना।




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