Supreme Court on Sabarimala case PIL was entertained in 2006 but would have been dismissed now आज दायर होती तो खारिज हो जाती याचिका, सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा ऐसा?, India News in Hindi - Hindustan
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आज दायर होती तो खारिज हो जाती याचिका, सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा ऐसा?

सितंबर 2018 में, पांच-सदस्यीय संविधानिक पीठ ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था।

Thu, 9 April 2026 02:40 PMJagriti Kumari लाइव हिन्दुस्तान
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आज दायर होती तो खारिज हो जाती याचिका, सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा ऐसा?

Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले पर चल रही सुनवाई के दौरान पीठ ने बुधवार को कुछ बेहद अहम टिप्पणियां की हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 2006 में जिस जनहित याचिका को स्वीकार किया गया था, आज अगर वही याचिका दाखिल होती तो उसे खारिज कर दिया जाता। अदालत ने यह भी माना कि आज के समय में जनहित याचिकाओं का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है और कई बार इन्हें निजी एजेंडा पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि सबरीमाला की परंपरा को किसी भगवान अय्यप्पा के श्रद्धालु ने चुनौती नहीं दी थी। इस पर सवाल उठाते हुए जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि अगर आज कोई वकीलों का संगठन इस मुद्दे पर मुकदमा दायर करता, तो उसे तुरंत खारिज कर दिया जाता। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि इस मामले में पहले से अदालत का फैसला मौजूद है, इसलिए अब अदालत को यह तय करना है कि धार्मिक मामलों में न्यायिक दखल की सीमा क्या होनी चाहिए।

तुषार मेहता ने दिए तर्क

दरअसल कार्यवाही जब खत्म होने वाली थी, पीठ में शामिल जस्टिस बी वी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह जानना चाहा कि सबरीमाला मामले में याचिकाकर्ता कौन है। उन्होंने पूछा, ''आपने जो दलील दी है, उससे यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता अयप्पा के भक्त नहीं हैं। किसी भी श्रद्धालु ने इस कोर्ट में इसे चुनौती नहीं दी है। तो फिर, वे याचिकाकर्ता कौन हैं जो इसे चुनौती दे रहे हैं?''

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इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' नामक वकीलों का संगठन है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ''वे (अयप्पा के) भक्त नहीं हैं, लेकिन हमें स्पष्टता दीजिए। क्या भगवान अयप्पा का कोई भक्त इसे चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर कर सकता है? यदि कोई गैर-श्रद्धालु, यानी वह व्यक्ति जिसका उस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या यह न्यायालय ऐसी याचिका पर विचार कर सकता है?'' उन्होंने कहा, ''हम सभी प्रशिक्षित हैं। हम सभी निचली अदालतों में वकालत कर चुके हैं। यदि कोई मुकदमा किसी संगठन द्वारा दायर किया जाता है, तो पहला प्रश्न सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 11(ए) के अंतर्गत आएगा। यदि मुकदमा दायर करने का कोई आधार सिद्ध नहीं होता या कोई संबंध नहीं होता, तो वाद खारिज कर दिया जाएगा।''

CJI ने किसे कहा ‘अदृश्य पीड़ित’?

इस पर CJI ने कहा कि उन्होंने ऐसे याचिकाकर्ताओं के लिए अक्सर न्यायिक प्रणाली के 'अदृश्य पीड़ित' शब्द का प्रयोग किया है। मेहता ने इसे मौन बहुमत और मुखर अल्पसंख्यक के बीच की लड़ाई बताया। सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ''नौ-सदस्यीय पीठ विरले गठित होती है। जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र की शुरुआत 'बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ' मामले में उस समय हुई थी, जब लोगों के पास अदालत तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था। मैंने अपने लिखित निवेदनों में यह बताया है कि आज न्यायिक प्रणाली कहीं अधिक पारदर्शी हो गई है। ई-फाइलिंग के माध्यम से अब एक पत्र भी अदालत तक पहुंच सकता है।''

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उन्होंने कहा, ''अब किसी भी वर्ग के प्रतिनिधित्व के लिए किसी दूसरे के माध्यम से प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी के पास साधन नहीं हैं, तो वे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं और कह सकते हैं: मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, मुझे सलाह दें, या मेरी ओर से उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दायर करें।'' मेहता ने कहा, "तो फिर, ऐसी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई क्यों की जानी चाहिए? और हम जानते हैं कि आज कई जनहित याचिकाएं प्रायोजित होती हैं। इनके पीछे कोई और होता है।''

एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दाखिल होती हैं याचिकाएं- CJI

CJI सूर्यकांत ने इस पर जवाब देते हुए कहा कि न्यायालय जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करने में बहुत सावधानी बरत रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अदालतें जनहित याचिकाओं को लेकर ज्यादा सतर्क हुई हैं, क्योंकि कई लोग छिपे हुए मकसद या अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ऐसी याचिकाएं दाखिल कर रहे हैं।

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बहस जारी

गौरतलब है कि सितंबर 2018 में, पांच-सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय एक अन्य पीठ ने दो के मुकाबले तीन के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक अन्य पीठ के पास भेज दिया था। फिलहाल इस मामले की सुनवाई जारी है।