रूह अफ़जा पर छिड़ा विवाद, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया मामला; अदालत ने क्या सुनाया फैसला?
विवाद की जड़ यह थी कि क्या रूह अफजा जिसमें 10 फीसदी फ्रूट जूस होता है, को कानूनी तौर पर फ्रूट ड्रिंक की कैटेगरी में डाला सकता है या नहीं। अदालत ने इस मामले पर फैसला सुना दिया है।

रूह अफ़जा भारत में हमेशा से ही एक पसंदीदा पेय रहा है। खासकर गर्मियों में मौसम में इसकी लोकप्रियता सालों से बनी हुई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रूह अफ़जा एक फ्रूट ड्रिंक है या शरबत? यह मामला सुनने में उतना पेचीदा भले ही ना लगे लेकिन इस बात को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस मशहूर ड्रिंक पर लंबे समय से चल रही टैक्स की लड़ाई को सुलझाते हुए फैसला सुनाया कि रूह अफ़जा को केवल इसलिए ज्यादा टैक्स वाले ब्रैकेट में नहीं डाला जा सकता क्योंकि इसे शरबत के तौर पर बेचा जाता है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने इस पर फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि टैक्स कानून के तहत रूह अफ़जा एक फ्रूट ड्रिंक है। अदालत ने पाया कि इस ड्रिंक को फलों से ही बनाया जाता है और इसे सिर्फ डाइल्यूट करने के लिए पानी में मिलाया जाता है।
क्या था विवाद?
दरअसल कोर्ट में रूह अफ़जा बनाने वाली कंपनी हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज की अपील पर सुनवाई चल रही थी। इस विवाद की जड़ यह थी कि क्या रूह अफ़जा, जिसमें 10 फीसदी फ्रूट जूस होता है और जिसे इनवर्ट शुगर सिरप और हर्बल डिस्टिलेट के साथ मिलाया जाता है, को कानूनी तौर पर फ्रूट ड्रिंक कहा जा सकता है या नहीं।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और टैक्स अधिकारियों के 2018 के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिसमें रूह अफ़जा को उत्तर प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स (UPVAT) एक्ट के तहत 12.5 फीसदी टैक्सेबल अनक्लासिफाइड आइटम के तौर पर लेबल किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने माना कि रूह अफ़जा को UPVAT एक्ट के शेड्यूल II (पार्ट A) की एंट्री 103 के तहत फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट के तौर पर क्लासफाई किया जाया जाना चाहिए जिस पर 1 जनवरी, 2008 और 31 मार्च, 2012 के बीच संबंधित असेसमेंट पीरियड के दौरान 4 फीसदी की रियायती VAT दर लागू होती है।
क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
इससे पहले अधिकारियों ने फूड सेफ्टी रेगुलेशन के तहत जारी एक रेगुलेशन का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि फ्रूट सिरप में कम से कम 25 फीसदी फ्रूट जूस होना चाहिए। चूंकि रूह अफ़जा में यह सिर्फ 10 फीसदी होता है, इसलिए लाइसेंसिंग के मकसद से इसे 10 फीसदी फ्रूट जूस वाला नॉन-फ्रूट सिरप बताया गया। इस आधार पर, डिपार्टमेंट ने तर्क दिया कि टैक्स के मकसद से इसे फ्रूट ड्रिंक नहीं माना जा सकता। इस तर्क को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि फूड सेफ्टी कानून के तहत रेगुलेटरी क्लासिफिकेशन तब तक फिस्कल इंटरप्रिटेशन को कंट्रोल नहीं कर सकता जब तक कि टैक्सिंग कानून साफ तौर पर ऐसी परिभाषाओं को न अपना ले।




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