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'मेरे चैंबर से बाहर निकल जाओ...' CJI सूर्यकांत को पड़ी थी सीनियर जज की डांट; बदल गई जिंदगी

CJI सूर्यकांत ने शुरुआती करियर का एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाया। जानिए कैसे एक जज की डांट और उनकी एक सलाह ने सीजेआई के न्यायिक अधिकारी बनने के सपने को तोड़ दिया था और उन्हें वकालत के शिखर पर पहुंचा दिया।

Fri, 8 May 2026 01:11 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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'मेरे चैंबर से बाहर निकल जाओ...' CJI सूर्यकांत को पड़ी थी सीनियर जज की डांट; बदल गई जिंदगी

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक बेहद दिलचस्प वाकया देखने को मिला, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अपने शुरुआती करियर का एक निजी किस्सा शेयर किया। सीजेआई ने बताया कि कैसे एक सीनियर जज की डांट और उनकी एक सलाह ने उन्हें न्यायिक सेवा में जाने से रोक दिया था और उन्होंने वकालत का रास्ता चुना।

वकील की याचिका और CJI की सलाह

यह वाकया तब हुआ जब सीजेआई दिल्ली न्यायिक सेवा परीक्षा से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की ही एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) प्रेरणा गुप्ता ने खुद दाखिल की थी। याचिका में परीक्षा के अंकों में कथित बदलाव को चुनौती दी गई थी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई ने वकील को बताया कि कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन (रीवैल्यूएशन) तभी संभव है जब नियमों में इसकी स्पष्ट इजाजत हो। अदालत इस मामले में दखल देने की इच्छुक नहीं थी। जब सीजेआई को पता चला कि याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट में ही एओआर हैं, तो उन्होंने पूछा, "फिर आप न्यायिक अधिकारी क्यों बनना चाहती हैं?"

सीजेआई ने उन्हें सलाह दी कि वे 'हायर ज्यूडिशियल सर्विस एग्जाम' की तैयारी करें। इस पर वकील ने बताया कि वह अभी इसके लिए जरूरी न्यूनतम 35 वर्ष की आयु पूरी नहीं कर पाई हैं। इसके बाद सीजेआई ने वकील से कहा- अगली बार सुपीरियर ज्यूडिशियल सर्विसेज के लिए अप्लाई करें। लेकिन मैं आपके साथ एक बात शेयर करना चाहता हूं कि आपको इस याचिका पर जोर क्यों नहीं देना चाहिए।

जब जज ने सीजेआई को चैंबर से निकाल दिया था

सीजेआई सूर्यकांत ने अपनी लॉ की पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए बताया कि जब वे अंतिम वर्ष के छात्र थे, तब उन्हें न्यायिक सेवा परीक्षा देने की अनुमति मिल गई थी। उन्होंने लिखित परीक्षा पास कर ली थी और इंटरव्यू का इंतजार कर रहे थे।

इसी बीच इंटरव्यू में देरी होने लगी और उन्होंने हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। उन्होंने अपना पहला केस एक सीनियर जज के सामने लड़ा था। यह 'सुनीता रानी बनाम बलदेव राज' का वैवाहिक विवाद था, जिसमें सीनियर जज ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सिजोफ्रेनिया के आधार पर दी गई तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया था। बाद में, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद चयन प्रक्रिया में बदलाव हुआ और हाईकोर्ट के जज इंटरव्यू पैनल में विषय विशेषज्ञ के तौर पर शामिल होने लगे।

वही सीनियर जज भी पैनल का हिस्सा थे। जब जज ने लोक सेवा आयोग से आई उम्मीदवारों की लिस्ट में सूर्यकांत का नाम देखा, तो उन्हें अपने चैंबर में बुलाया।

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सीजेआई ने बताया, "उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या तुम न्यायिक अधिकारी बनना चाहते हो? मैंने कहा- हां। इस पर उन्होंने कहा- मेरे चैंबर से बाहर निकल जाओ।" सीजेआई के मुताबिक, इस घटना ने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया था। उन्होंने कहा, "मैं कांपते हुए बाहर आया। मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए थे। मुझे लगा कि मैं न्यायिक अधिकारी बनूंगा, लेकिन उन्होंने मुझे इस तरह से झिड़क दिया।"

'बार आपका इंतजार कर रहा है'

हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले दिन जज ने उन्हें फिर से अपने चैंबर में बुलाया और एक बिल्कुल अलग सलाह दी। सीजेआई ने याद करते हुए कहा, "अगले दिन उन्होंने मुझे फिर बुलाया और कहा- अगर तुम अधिकारी बनना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है। लेकिन मेरी सलाह है कि न्यायिक अधिकारी मत बनो। बार (वकील समुदाय) तुम्हारा इंतजार कर रहा है।"

इस बातचीत के बाद सीजेआई ने तय किया कि वे इंटरव्यू देने नहीं जाएंगे। उन्होंने बताया, "मैं चैंबर से बाहर आया और फैसला किया कि मैं इंटरव्यू के लिए नहीं जाऊंगा। मैंने अपने माता-पिता को यह बात नहीं बताई क्योंकि मुझे पता था कि वे नाराज होंगे। दो-तीन महीने बाद, मैंने इधर-उधर कुछ झूठ बोला और जाने से मना कर दिया।"

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वकील से पूछा- क्या मेरा फैसला सही था?

यह किस्सा सुनाने के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने मुस्कुराते हुए याचिकाकर्ता वकील से पूछा, "अब आप मुझे बताइए, क्या मेरा फैसला गलत था या सही?" जब वकील ने मुस्कुराकर जवाब दिया, तो सीजेआई ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए कहा, "इसलिए इस याचिका पर जोर मत दीजिए, अगले साल उच्च न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए उपस्थित हों और आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं!" जानकारी के लिए बता दें कि सीजेआई सूर्यकांत ने 1984 में वकालत शुरू की थी। साल 2000 में वे हरियाणा के महाधिवक्ता बने और 2004 में उन्हें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था।