मोहर्रम का चांद दिखा, शोक में डूबा शिया समुदाय
अमरोहा जिले में मोहर्रम का चांद दिखते ही शिया समुदाय शोक में डूब गया। इमामबाड़ों में काले अलम लगाए गए हैं और मातामी जुलूसों की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। शहीद इमाम हुसैन और उनके साथी की शहादत का गम मनाने के लिए ये जुलूस निकाले जाते हैं, जो 10 मोहर्रम तक जारी रहेंगे।

अमरोहा, संवाददाता। स्लामिक कैलेंडर के मुताबिक माहे मोहर्रम का चांद नजर आते ही जिले में शिया समुदाय शोक में डूब गया। इमामबाड़ों में काले अलम लगाते हुए फर्श-ए-अजा बिछा दी गई। नौबत बजा आजादरी का ऐलान किया गया। मजलिसों के साथ ही मात्मदारी का दौर शुरू हो गया। वहीं, मातमी जुलूसों को लेकर भी तैयारियां शुरू कर दी गईं हैं। गौरतलब है कि कमोबेश 1400 साल पूर्व ईराक के शहर कर्बला के तपते रेगिस्तान में यजीद की फौज ने रसूले खुदा के नवासे हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समेत उनके 72 साथियों को भूख और प्यास की शिद्दत के बीच शहीद कर दिया था।
बीबी फातिमा को लख्ते जिगर की शहादत का पुरसा देने के लिए मोहर्रम के महीने में कर्बला की शहादत का गम मनाया जाता है। शहीदों की याद में अमरोहा व नौगावां सादात में होने वाली अजादारी देश-विदेश में अपनी अलग पहचान रखती है। अमरोहा शहर में लगभग 72 इमामबाड़े हैं, मोहर्रम का चांद दिखते ही जहां काले अलम लगा दिए जाते हैं। अमरोहा में जहां तीन मोहर्रम से जुलूस की शुरुआत होती हैं तो वहीं नौगावां सादात में पहली मोहर्रम से ही हुसैनी काफिले निकलने शुरू हो जाते हैं। मातमदारी का यह सिलसिला दस मोहर्रम तक लगातार जारी रहता है। मंगलवार को मोहर्रम का चांद दिखते ही इमामबाड़ों पर काले अलम लगा दिए गए। इसके बाद हुसैनी बाजा बजाकर अजादारी का ऐलान किया गया। मातमदारी के लिए फर्श-ए-अजा बिछा दी गई। बेल्जियम से आए कीमती झाड़-फानूस से अजाखानों को सजाया गया है। देश-विदेश से लोगों की आमद के बीच घरों से लेकर अजाखानों तक की रंगाई-पुताई व सफाई का काम लगभग पूरा हो चुका है। जुलूस अजा में शामिल होने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग अमरोहा आ चुके हैं। शहर में हुसैनी अजाखानों की बड़ी तादाद है। इनमें से कुछ अजाखाने मुगल काल में तामीर हुए हैं। जिनके दर-ओ-दीवार की बेहतरीन नक्काशी एक नजर देखते ही बनती है। वहीं इस साल भी ज्यादातर अजाखानों को बेल्जियम से आए कीमती झाड़-फानूस से सजाया गया है। मजलिसों में हुसैनियों की आमद को लेकर बड़े-बड़े कालीन बिछाए गए हैं, जहां मातम बरपा किया जाता है। मोहर्रम का चांद दिखते ही मजलिसों और मातमदारी का दौर शुरू हो गया है। इमाम जुमा-वल-जमात मौलाना डॉ.सियासत नकवी ने बताया की मोहर्रम की दस तारीख को इमाम हुसैन समेत उनके 72 साथियों के काफिले को यजीद की फौज ने कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया था। इन्हीं शहीदों की याद में गमगीन माहौल में मातमी जुलूस बरामद होते हैं।




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