कोई कहेगा मुझे तो नॉनवेज लेकर मंदिर जाना है; सबरीमाला पर सुनवाई में सरकार बोली- कोर्ट दूर रहे
केंद्र सरकार ने बहस के दौरान दलील दी कि यदि इस तरह से अधिकार की बात की जाए तो कई मंदिर ऐसे हैं, जहां सिर्फ वेजिटेरियन खाना ही मिलता है। वहां कोई नॉनवेज ना खा सकता है और ना ले जा सकता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई कहे कि मैं तो नॉनवेज लेकर जाना चाहता हूं तो मंदिर उसे रोकेगा।

सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं की एंट्री पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने एक बार फिर से परंपराओं का हवाला दिया। अडिशनल सॉलिसिटर जनरल नटराज ने कहा कि हर मंदिर और हर संप्रदाय की अलग मान्यता होती है। इसको संवैधानिक या कानूनी दायरे में अथवा महिला एवं पुरुष के अधिकार के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि इस तरह से अधिकार की बात की जाए तो कई मंदिर ऐसे हैं, जहां सिर्फ वेजिटेरियन खाना ही मिलता है। वहां कोई नॉनवेज ना खा सकता है और ना ले जा सकता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई कहे कि मैं तो नॉनवेज लेकर जाना चाहता हूं तो मंदिर उसे रोकेगा।
ऐसा इसलिए क्योंकि मंदिर की परंपरा में नॉनवेज ले जाना सही नहीं माना जाता। अब वह शख्स संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तो कह सकता है कि नॉनवेज खाना मेरा अधिकार है। लेकिन उसके पास ऐसा कोई हक नहीं है कि वह मंदिर में आस्था रखने वाले अन्य लोगों को आहत करे। उनकी आस्था से खिलवाड़ करे। अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ऐसी ही स्थिति शराब को लेकर है। कई मंदिरों में यह प्रसाद के रूप में मिलती है। कल को कोई यह भी कह सकता है कि आखिर शराब को कैसे प्रसाद माना जा सकता है। साउथ इंडिया के कई मंदिरों में ऐसी परंपरा है और लोग उस पर सवाल भी उठा सकते हैं।
ए़एसजी नटराज ने कहा कि यहां सवाल यह भी आता है कि अलग-अलग संप्रदायों की मान्यता में अंतर है। ऐसी स्थिति में उनकी मान्यता को लेकर कोई बाहरी अदालत कैसे फैसला कर सकती है। उन्होंने कहा कि भले ही कोई परंपरा किसी को सही लगे अथवा गलत। लेकिन यह उस संप्रदाय का मसला है। उसमें अदालत का दखल नहीं हो सकता। आखिर यह अदालत कैसे तय कर सकती है कि कौन सा संप्रदाय किस चीज को मानेगा और किसे नहीं। उसकी क्या परंपरा सही है और क्या नहीं। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि जब टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है तो कोर्ट की मौजूदगी होती है।
अदालत बोली- यदि दो वर्गों में मतभेद हैं तो अदालत का दखल जरूरी
उन्होंने कहा कि एक समूह कहता है कि हम संप्रदाय हैं और हमारी यह मान्यता है। दूसरा कहता है कि ऐसा नहीं है। इसके अलावा किसी संप्रदाय को ही मानने वाला कोई व्यक्ति भी किसी चीज को चुनौती दे सकता है। यदि वह कहता है कि पूजा करने का यह तरीका नहीं है। फिर ऐसी स्थिति में कोर्ट की उपस्थिति जरूरी हो जाती है। इस पर एएसजी नटराज कहते हैं कि यदि ऐसा जरूरी होता भी है तो फिर सबूतों के आधार पर ही बात करनी होगी। वहीं इस मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि कई मंदिर ऐसे भी हैं, जहां पुरुषों का जाना वर्जित है। ऐसे में उसे मान्यता से अलग हटकर नहीं देखना चाहिए। उसे पुरुषों के अपमान से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।




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