Ritabrata Banerjee who once saw a glimpse of Lenin in Mamata Banerjee very person who sank TMC ship West Bengal जो दीदी में देखते थे लेनिन की झलक, उसी ऋतब्रत ने ममता की डुबोई नैया; कम्युनिस्टों ने भी था दुत्कारा, India News in Hindi - Hindustan
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जो दीदी में देखते थे लेनिन की झलक, उसी ऋतब्रत ने ममता की डुबोई नैया; कम्युनिस्टों ने भी था दुत्कारा

Ritabrata Banerjee: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TMC के अंदर उपजा यह विद्रोह किसी विचारधारा की लड़ाई नहीं है, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ एक तरह का गुस्सा है।

Thu, 4 June 2026 04:42 PMPramod Praveen पीटीआई, नई दिल्ली
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जो दीदी में देखते थे लेनिन की झलक, उसी ऋतब्रत ने ममता की डुबोई नैया; कम्युनिस्टों ने भी था दुत्कारा

Ritabrata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार (3 जून) को भारी हलचल देखने को मिली, जब पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी TMC के एक बागी विधायक ने 80 में से 58 विधायकों का समर्थन जुटाकर विधानसभा में खुद को विधायक दल का नेता और नेता प्रतिपक्ष घोषित करवा लिया। इससे ममता बनर्जी को करारा झटका लगा है क्योंकि कुछ दिनों पहले ही उन्होंने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष के लिए नामित किया था। बड़ी बात ये है कि जिस ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में TMC के अंदर ये सियासी खेल हुआ है, वह कुछ समय पहले तक ममता बनर्जी में रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन की झलक देखते थे लेकिन आज, वही ऋतब्रत उसी नेता के खिलाफ 'विद्रोह' का नेतृत्व कर रहे हैं। ऋतब्रत ने ममता दीदी के संघर्ष को देखकर उन्हें कभी जनहितैषी राजनीति का प्रतीक बताया था लेकिन आज उनकी राजनीतिक नैया को ही डुबो दिया है।

तृणमूल कांग्रेस के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना और बुधवार को अपने इस फैसले की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को दी। TMC में शामिल होने से पहले ऋतब्रत CPM में भी रह चुके हैं। 46 वर्षीय ऋतब्रत ने पूर्व में कहा था कि उन्होंने ममता बनर्जी को लाखों लोगों के बीच काम करते हुए देखकर जनहितैषी राजनीति पर लेनिन के प्रसिद्ध कथन को समझा, अब वह खुद तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पार्टी में सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं।

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ऋतब्रत को माकपा और तृणमूल, दोनों ने निकाला

ऋतब्रत की तुलना महाराष्ट्र के नेता एकनाथ शिंदे से की जा रही है, जिनके विद्रोह के कारण तत्कालीन शिवसेना में विभाजन हुआ था। एक अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ''शायद ये (ऋतब्रत) बंगाल के इकलौते प्रमुख नेता हैं जिन्हें माकपा और तृणमूल, दोनों ने निष्कासित किया है।''

SFI से ली सियासत में एंट्री

धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और टेलीविजन पर राजनीतिक बहसों में अलग पहचान बनाने वाले ऋतब्रत ने 2008 में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के महासचिव के रूप में पहली बार प्रसिद्धि हासिल की और ममता बनर्जी के सत्ता में आने के दौरान वामपंथी युवा शाखा के सबसे मशहूर चेहरों में से एक बन गये। वर्ष 2011 में, जब वाम मोर्चा लगभग तीन दशकों की सत्ता के बाद सबसे मुश्किल चुनाव का सामना कर रहा था, तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कोलकाता दक्षिण लोकसभा उपचुनाव में टीएमसी के दिग्गज नेता सुब्रत बख्शी के खिलाफ ऋतब्रत को मैदान में उतारा, लेकिन वह हार गए।

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सीताराम येचुरी के भी करीबी

तीन साल बाद, बंगाल के हाल के इतिहास में सबसे कड़े मुकाबले वाले राज्यसभा चुनावों में से एक में माकपा ने ऋतब्रत को संसद के ऊपरी सदन में भेजा। महज 35 साल की उम्र में उनकी पदोन्नति ने पश्चिम बंगाल माकपा मुख्यालय में हलचल मचा दी। कई वरिष्ठ नेता इस कदम से खुश नहीं थे। फिर भी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य इस प्रतिभाशाली युवा नेता के साथ मजबूती से खड़े रहे। ऋतब्रत को पूर्व माकपा महासचिव सीताराम येचुरी का भी करीबी माना जाता था।

बुर्जुआ कह CPM ने भी दुत्कारा था

हालांकि, पार्टी और ऋतब्रत के बीच संबंध जल्द ही खराब हो गए। पार्टी के सहयोगियों द्वारा एक वामपंथी नेता की विलासितापूर्ण जीवनशैली पर सवाल उठाए गए, जबकि पार्टी सादगीपूर्ण राजनीति पर गर्व करती थी। उनकी कलाई पर एप्पल वॉच और शर्टकी जेब में महंगी मोंट ब्लैंक पेन देखकर कभी सीपीएम के नेता ही उन पर भड़क गए थे और उन्हें बुर्जुआ कहकर दुत्कारा था। बाद में वर्ष 2017 में ऋतब्रत को पहले सीपीएम से निलंबित किया गया और बाद में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। वह ऐसे नेता हैं, जो जहां रहे, वहीं पार्टी के अंदर विद्रोह का बिगुल फूंका और पार्टी से निकाले गए। वह TMC से भी निकाले जा चुके हैं लेकिन अब सियासी पाशा पलट चुका है।

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वैसे ऋतब्रत का राजनीतिक निर्वासन अल्पकालिक ही रहा। इस दौरान, वह मुकुल रॉय और कैलाश विजयवर्गीय जैसे भाजपा नेताओं के करीबी बताए जाते थे। हालांकि, एक महिला से जुड़े पुलिस मामले के बाद, उन्होंने अपना रुख बदल लिया और तृणमूल के समर्थक मंचों पर दिखाई देने लगे। वर्ष 2020 तक, राज्यसभा में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद ऋतब्रत औपचारिक रूप से तृणमूल में शामिल हो गए थे।