लिपुलेख पर जहर उगल रहा नेपाल, फिर भी संकट में साथ खड़ा भारत; सस्ते दाम पर देगा खाद
नेपाल ने लिपुलेख दर्रे का जिक्र कर एक एक बार फिर सीमाएं लांघी थीं। भारत ने इस पर सख्त एतराज जताया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है।

नेपाल ने बीते दिनों लिपुलेख दर्रे का जिक्र कर एक बार फिर विवाद खड़ा दिया है। हालांकि इसके बाद भी भारत संकट की घड़ी में नेपाल की मदद को आगे आया है। दरअसल अमेरिका और ईरान बीच हालिया युद्ध की वजह से दुनिया भर में खाद की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में भारत खुद दोगुनी कीमत चुकाकर खाद खरीद रहा है। इस बीच पड़ोसी देश नेपाल में इसकी भारी कमी हो गई है। इसके बाद अब भारत नेपाल को वैश्विक बाजार से काफी कम दाम पर खाद उपलब्ध कराने जा रहा है।
इससे पहले बालेन शाह के नेतृत्व वाली नेपाल की सरकार ने हाल ही में लिपुलेख दर्रे को लेकर विवादित बयान दिया था। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाला यह दर्रा भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है, लेकिन नेपाल पिछले तीन दशकों से इस पर अपना दावा ठोक रहा है। हालांकि एक तरफ नेपाल जहां भारत के खिलाफ विरोध दर्ज करा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अपनी खेती बचाने के लिए भारत से ही मदद की गुहार लगाई है।
खाद संकट से जूझ रहा नेपाल
द काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में बुवाई का सीजन करीब है और देश में खाद की भारी कमी है। नेपाल को 2.5 लाख टन खाद की जरूरत है, जबकि स्टॉक में केवल 1.71 लाख टन ही बचा है। नेपाल के कृषि मंत्रालय के मुताबिक अगर वे वैश्विक बाजार से खाद खरीदते हैं, तो सरकार को करीब 80 अरब रुपये की सब्सिडी देनी होगी, जो उनकी क्षमता से बाहर है। संकट को देखते हुए अब नेपाल सरकार ने भारत की 'राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड' के साथ जी-टू-जी (सरकार से सरकार) समझौता किया है। इस समझौते के तहत 60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी (DAP) खरीदने की मंजूरी दी गई है।
घाटा सहकर नेपाल को खाद दे रहा भारत
बता दें कि भारत इन दिनों खुद महंगा खाद खरीदने को मजबूर है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान युद्ध से पहले भारत 512 डॉलर प्रति टन के हिसाब से यूरिया खरीद रहा था, जिसकी कीमत अब बढ़कर 959 डॉलर प्रति टन हो गई है। यानी भारत खुद लगभग दोगुनी कीमत चुका रहा है। हालांकि अब 2022 में हुए समझौते के तहत वह नेपाल को पुराने और सस्ते रेट पर खाद की गारंटी दे रहा है।
लिपुलेख को लेकर क्या बोला था नेपाल?
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बीते रविवार को भारत और चीन दोनों को विरोध पत्र भेजा है। नेपाल ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि भारत ने कोविड के बाद एक बार फिर लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने का एलान किया है। बता दें कि नेपाल का कहना है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का हिस्सा हैं। हालांकि भारत ने इस आपत्ति को सिरे से खारिज किया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख दर्रा 1954 से ही मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है। भारत ने कहा कि क्षेत्रीय दावों का एकतरफा और कृत्रिम विस्तार स्वीकार्य नहीं है और ये ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।




साइन इन