लिपुलेख दर्रे से व्यापार मत करना, भारत के फैसले से भड़का नेपाल; मिला दो टूक जवाब
नेपाल ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को 'मजबूत' करने के लिए कुछ विवादित कदम उठाए हैं। इनमें 2020 में नया नक्शा जारी करना और 2024 में 100 रुपये के नोट पर विवादित क्षेत्रों को शामिल करना शामिल है।

भारत ने मंगलवार को कहा कि वह चीन के साथ कुछ खास स्थल मार्गों के रास्ते व्यापार को बहाल करने पर सहमत हुआ है। हालांकि भारत के इस फैसले ने पड़ोसी देश नेपाल को नाराज कर दिया है। इसकी वजह है - लिपुलेख दर्रा। दरअसल चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक संयुक्त दस्तावेज जारी किया जिसमें कई अहम समझौतों पर सहमति जताई गई। दस्तावेज में कहा गया है कि दोनों पक्ष तीन निर्दिष्ट व्यापारिक बिंदुओं, यानी लिपुलेख दर्रा, शिपकी ला दर्रा और नाथू ला दर्रा के माध्यम से सीमा व्यापार को फिर से खोलने पर सहमत हुए हैं। नेपाल को लिपुलेख दर्रा के रास्ते व्यापार करने पर आपत्ति है क्योंकि वह इसे अपना हिस्सा मानता है। जबकि यह इलाका भारत के उत्तराखंड राज्य का हिस्सा है।
भारत का सख्त जवाब
भारत ने नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा लिपुलेख दर्रे के माध्यम से भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार की बहाली पर की गई टिप्पणियों पर सख्त जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में भारत का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के रास्ते सीमा व्यापार 1954 में शुरू हुआ था और यह दशकों से चल रहा है। हाल के वर्षों में कोविड और अन्य घटनाक्रमों के कारण इस व्यापार में व्यवधान आया था। अब दोनों पक्षों ने इसे फिर से शुरू करने पर सहमति जताई है। सीमा दावों के संबंध में, प्रवक्ता ने कहा कि नेपाल के दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं और न ही उचित हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी पक्ष द्वारा एकतरफा और कृत्रिम रूप से क्षेत्रीय दावों का विस्तार करना अस्वीकार्य है। जायसवाल ने यह भी दोहराया कि भारत, नेपाल के साथ सीमा से संबंधित बकाया मुद्दों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने के लिए रचनात्मक संवाद के लिए हमेशा तैयार है।
क्या बोला नेपाल?
नेपाल ने दोनों देशों से कहा है कि लिपुलेख उसका क्षेत्र है और उसने भारत से इस क्षेत्र में "सीमा व्यापार" न करने का आग्रह किया है, साथ ही चीन को स्पष्ट किया है कि यह क्षेत्र नेपाल की सीमा के भीतर है। नेपाली निदेश मंत्रालय ने प्रेस नोट जारी करते हुए कहा, "नेपाल सरकार का स्पष्ट मानना है कि नेपाल का आधिकारिक मानचित्र नेपाल के संविधान में शामिल है और इस मानचित्र में महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का अभिन्न अंग दर्शाया गया है। यह भी ज्ञात है कि नेपाल सरकार भारत सरकार से इस क्षेत्र में सड़क निर्माण/विस्तार, सीमा व्यापार जैसी कोई भी गतिविधि न करने का आग्रह करती रही है। यह भी ज्ञात हो कि मित्र देश चीन को सूचित किया जा चुका है कि यह क्षेत्र नेपाली भूभाग है। नेपाल और भारत के बीच घनिष्ठ एवं मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना के अनुरूप, नेपाल सरकार ऐतिहासिक संधियों, समझौतों, तथ्यों, मानचित्रों और साक्ष्यों के आधार पर कूटनीतिक माध्यमों से दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।"
क्यों खास है लिपुलेख दर्रा?
लिपुलेख दर्रा भारत के उत्तराखंड, नेपाल और चीन के त्रि-जंक्शन पर स्थित एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा है लेकिन नेपाल इसे अपनी सीमा का भाग बताता है। जिससे इसको लेकर भारत-नेपाल में विवाद चल रहा है। यह विवाद 1816 की सुगौली संधि से उत्पन्न होता है, जिसमें काली नदी को नेपाल और भारत के बीच सीमा रेखा के रूप में परिभाषित किया गया था। हालांकि, काली नदी के स्रोत को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद हैं, जिसके कारण यह विवाद बना हुआ है। नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, जबकि भारत का कहना है कि यह लिपुलेख के नीचे के झरनों से शुरू होती है।
हालिया घटनाक्रम क्या है?
चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान, भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। यह निर्णय 2015 के बाद पहली बार लिया गया है, जब दोनों देशों ने इसी तरह के व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका नेपाल ने कड़ा विरोध किया था। उस समय नेपाल ने दोनों देशों को राजनयिक नोट भेजकर इस समझौते पर आपत्ति जताई थी। 20 अगस्त यानी आज फिर से नेपाल ने इस भारत-चीन समझौते पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए एक बयान जारी किया। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा, "लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल का अंग हैं। हम अपने पड़ोसियों से इस क्षेत्र में कोई भी गतिविधि न करने का आग्रह करते हैं। नेपाल भारत के साथ सीमा मुद्दों को राजनयिक बातचीत के माध्यम से हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।"
लिपुलेख दर्रा न केवल एक प्राचीन व्यापार और तीर्थयात्रा मार्ग है, बल्कि यह भारत और चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह दर्रा भारत के पिथौरागढ़ जिले को तिब्बत से जोड़ता है और सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। भारत ने 2020 में लिपुलेख तक 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था, जिसका नेपाल ने कड़ा विरोध किया था।
भारत का रुख
भारत ने हमेशा यह दावा किया है कि लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं और उसने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास को उचित ठहराया है। भारत का कहना है कि यह सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रियों और स्थानीय व्यापारियों की सुविधा के लिए बनाई गई है।
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