नेहरू के दौर का 'ब्रेन ड्रेन', मोदी युग में कैसे बना भारत का सबसे बड़ा कूटनीतिक हथियार?
Modi vs Nehru and india brain drain: 10 जून को पीएम मोदी ने सबसे लंबे समय तक चुने हुए प्रधानमंत्री का नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। जानिए कैसे नेहरू युग की चिंता 'ब्रेन ड्रेन' आज मोदी युग में भारत का सबसे बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक हथियार बन गया।

Modi vs Nehru and india brain drain: आज, 10 जून 2026 का दिन भारतीय राजनीति के पन्नों में एक अहम मुकाम के तौर पर दर्ज हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा करने वाले 'चुने हुए' प्रधानमंत्री के रूप में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ऐतिहासिक रिकॉर्ड पार कर लिया है। इस लंबी राजनीतिक यात्रा और कूटनीतिक विरासत का आकलन करते हुए, एक सबसे बड़ा बदलाव जो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, वह है- भारतीय प्रवासी समुदाय को देखने और इस्तेमाल करने का नजरिया।
जो बात कभी भारत में 'ब्रेन ड्रेन' यानी प्रतिभा पलायन के रूप में एक राष्ट्रीय चिंता का विषय थी, वह आज वैश्विक मंच पर भारत की सबसे प्रभावशाली 'सॉफ्ट पावर' और रणनीतिक कूटनीति का हथियार बन चुकी है।
'ब्रेन ड्रेन': नेहरू युग की राष्ट्रीय चिंताएं
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में, भारत को अपने राष्ट्र निर्माण के लिए इंजीनियरों, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की सख्त जरूरत थी। प्रधानमंत्री नेहरू ने आईआईटी (IIT), एम्स (AIIMS) और आईआईएम (IIM) जैसे उत्कृष्ट संस्थानों की नींव रखी। जब इन सरकारी वित्तपोषित संस्थानों से पढ़कर उच्च कोटि की प्रतिभाएं अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देशों में बसने लगीं, तो इसे भारत की बौद्धिक संपदा और सीमित संसाधनों के सीधे नुकसान के तौर पर देखा गया।
उस दौर की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित थी। सरकार प्रवासी भारतीयों के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव तो रखती थी, लेकिन उनके जरिए दूसरे देशों की घरेलू राजनीति या कूटनीति को प्रभावित करने का कोई सक्रिय प्रयास नहीं किया जाता था। विदेश जाने वालों को अक्सर ऐसे लोगों के रूप में देखा जाता था, जिन्होंने अपने करियर के लिए मातृभूमि की सेवा को पीछे छोड़ दिया।
डॉ. हरगोविंद खुराना: 'ब्रेन ड्रेन' की सबसे बड़ी कसक
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में 'ब्रेन ड्रेन' का दर्द क्या था, इसे डॉ. हरगोविंद खुराना की कहानी से बेहतर कोई नहीं समझा सकता। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब डॉ. खुराना भारत लौटे, तो उन्होंने कई संस्थानों में नौकरी के लिए आवेदन किया। बताया जाता है कि उन्हें एक कॉलेज में साधारण प्रोफेसर की नौकरी तक के लिए मना कर दिया गया था क्योंकि उनके पास 'सही सिफारिश' नहीं थी।
सिस्टम से निराश होकर वे वापस विदेश चले गए। कुछ सालों बाद, 1968 में उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीता। जब यह खबर भारत पहुंची, तो तत्कालीन नीति-निर्माताओं को यह अहसास हुआ कि लालफीताशाही और संसाधनों की कमी के कारण देश ने अपनी कितनी बड़ी बौद्धिक संपदा खो दी है। यह किस्सा दशकों तक भारत के 'ब्रेन ड्रेन' का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहा। उन्हें आनुवंशिक कोड (जेनेटिक कोड) की व्याख्या के लिए 1968 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया था
नेहरू की प्रवासियों को सलाह: उसी देश के प्रति वफादार रहें
नेहरू युग में भारतीय प्रवासियों को राजनीतिक कूटनीति से अलग रखने की नीति का एक मशहूर वाकया 1950 के दशक का है। उस समय पूर्वी अफ्रीका और मलाया (अब मलेशिया) में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते थे, जो स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के कारण असुरक्षित महसूस कर रहे थे।
जब इन प्रवासियों ने भारत सरकार से मदद और हस्तक्षेप की उम्मीद की, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद और सार्वजनिक मंचों से स्पष्ट कहा कि जो भारतीय दूसरे देशों में बस गए हैं, उन्हें उसी देश (मेजबान देश) के प्रति पूरी तरह वफादार होना चाहिए और भारत से राजनीतिक सुरक्षा की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यह उस दौर की गुटनिरपेक्ष और अहस्तक्षेप की नीति का हिस्सा था।
मोदी युग: 'ब्रेन ड्रेन' से 'ब्रेन गेन' तक का सफर
2014 में सत्ता में आने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति ने प्रवासी भारतीयों को एक 'दायित्व' या 'खोई हुई प्रतिभा' मानने के बजाय, उन्हें भारत के 'रणनीतिक एसेट' के रूप में परिभाषित किया।
कूटनीतिक आयोजनों का नया मॉडल
प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय मूल के लोगों के साथ बड़े पैमाने पर संवाद की एक नई शैली विकसित की। इन आयोजनों ने मेजबान देशों के नेताओं को यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय समुदाय वहां की राजनीति और अर्थव्यवस्था में कितना मायने रखता है:
मैडिसन स्क्वायर गार्डन (2014): अमेरिका में भारतीय समुदाय के बीच इस भव्य कार्यक्रम ने दुनिया को पहली बार भारतीय प्रवासियों की संगठित शक्ति का अहसास कराया।
वेम्बली स्टेडियम, लंदन (2015): तत्कालीन ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरून के साथ मंच साझा करते हुए, भारत ने ब्रिटेन की राजनीति में भारतीय वोटर्स के प्रभाव को रेखांकित किया।
हाउडी मोदी, ह्यूस्टन (2019): तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में 50 हजार से अधिक प्रवासियों का यह आयोजन भारत-अमेरिका संबंधों में एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक था।
अहलान मोदी, यूएई (2024): खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों की ताकत और भारत-यूएई की मजबूत होती साझेदारी का यह एक बड़ा प्रतीक बना।
एक रणनीतिक हथियार कैसे बना भारतीय डायस्पोरा
प्रवासी भारतीयों को कूटनीतिक ताकत बनाने के पीछे केवल भव्य आयोजन नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत आर्थिक और रणनीतिक आधार है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन चुका है जो रेमिटेंस के मामले में 120 बिलियन डॉलर (लगभग 10 लाख करोड़ रुपये) का आंकड़ा पार कर चुका है। यह विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सीधा योगदान है।
गूगल (सुंदर पिचाई), माइक्रोसॉफ्ट (सत्या नडेला) से लेकर आईबीएम और एडोब तक, भारतीय मूल के सीईओ वैश्विक तकनीक को दिशा दे रहे हैं। भारत सरकार ने इस नेटवर्क का उपयोग भारत में निवेश और 'डिजिटल इंडिया' को बढ़ावा देने के लिए किया है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन: जब अमेरिकी राजनेताओं को समझ आई 'वोट बैंक' की ताकत
मोदी युग में इस नीति के पूरी तरह से पलटने का सबसे दिलचस्प किस्सा 2014 के 'मैडिसन स्क्वायर गार्डन' कार्यक्रम का है। जब यह तय हुआ कि न्यूयॉर्क में 20,000 से ज्यादा भारतीय-अमेरिकी एक स्टेडियम में जुटेंगे, तो अमेरिकी डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियों के नेता हैरान रह गए।
इस कार्यक्रम में 30 से अधिक अमेरिकी सांसद (कांग्रेसमैन) और सीनेटर हिस्सा लेने पहुंचे। वे केवल भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ था कि उनके अपने चुनाव क्षेत्रों में रहने वाले भारतीय कितने संगठित हैं और उनका वोट बैंक कितना मायने रखता है। इस एक आयोजन ने अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय को रातों-रात एक 'पावरफुल लॉबी' बना दिया।
आज अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की संसदों में भारतीय मूल के सांसदों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर है। यह समूह भारत के हितों (जैसे सिविल न्यूक्लियर डील, एच-1बी वीजा नीतियां, या आतंकवाद पर भारत का रुख) के लिए पश्चिमी देशों में एक अनौपचारिक लेकिन बेहद मजबूत 'लॉबी' का काम करता है।
नेहरू युग में जिन प्रतिभाओं को खो देने का डर था, दरअसल उसी पीढ़ी और उनके बच्चों ने आज वैश्विक मंच पर वह मुकाम हासिल किया है जिसका लाभ मोदी सरकार की मुखर विदेश नीति उठा रही है। नेहरू के बनाए संस्थानों की उपज ने दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया और मोदी के दौर की नीतियों ने उस बिखरी हुई शक्ति को एक सूत्र में पिरोकर कूटनीतिक मंच पर एक 'पावर ब्लॉक' में तब्दील कर दिया।
ब्रेन ड्रेन को एक सॉफ्ट पावर में बदलने की यह यात्रा दर्शाती है कि जब कोई देश अपने नागरिकों (चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में हों) को एक मजबूत पुल के रूप में इस्तेमाल करता है, तो विदेशी संबंध केवल संधियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों से लोगों के जुड़ाव की एक मजबूत वैश्विक कूटनीति बन जाते हैं।




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