mother is natural guardian of child after father Allahabad High Court say in property Case पिता के बाद मां ही बच्चे की गार्जियन; जानें प्रॉपर्टी केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा, India News in Hindi - Hindustan
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पिता के बाद मां ही बच्चे की गार्जियन; जानें प्रॉपर्टी केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर संपत्ति संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति है और मां परिवार की वयस्क सदस्य के रूप में उसका प्रबंधन कर रही है, तो नाबालिग बच्चे के हिस्से की बिक्री के लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते बिक्री बच्चे के कल्याण और हित में हो।

Mon, 30 March 2026 05:30 PMDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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पिता के बाद मां ही बच्चे की गार्जियन; जानें प्रॉपर्टी केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा क्यों कहा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि पिता की मृत्यु के बाद मां ही नाबालिग बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक (नेचुरल गार्जियन) होती है। अदालत ने कहा कि अगर संपत्ति संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति है और मां परिवार की वयस्क सदस्य के रूप में उसका प्रबंधन कर रही है, तो नाबालिग बच्चे के हिस्से की बिक्री के लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते बिक्री बच्चे के कल्याण और हित में हो। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकलपीठ ने श्रीमती डोली बनाम श्रीमती शकुंतला देवी मामले में यह फैसला सुनाया। यह प्रथम अपील (फर्स्ट अपील फ्रॉम ऑर्डर) 23 मार्च 2026 को पारित की गई।

दरअसल, सहारनपुर जिले की एक विधवा महिला श्रीमती डोली ने अपनी नाबालिग बेटी की उच्च शिक्षा के लिए संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति में उसके 1/4 हिस्से को बेचने की अनुमति मांगी थी। निचली अदालत ने उन्हें अभिभावक तो नियुक्त कर दिया, लेकिन संपत्ति बेचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया और मां को बिक्री की अनुमति प्रदान कर दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मां ( श्रीमती डोली ) के वकील ने तर्क दिया कि हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 12 के अनुसार निचली अदालत द्वारा बिक्री की अनुमति देने से इनकार गलत था। सास ने भी मां की प्रार्थना का समर्थन किया था। इस पर न्यायालय ने अपने आदेश में हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 का हवाला देते हुए कहा कि पिता के बाद माता ही नाबालिग का प्राकृतिक अभिभावक होती है। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता मां, अधिनियम के तहत प्राकृतिक अभिभावक होने के साथ-साथ संयुक्त परिवार की वयस्क सदस्य के रूप में प्रबंधक की भूमिका निभा रही हैं। इसलिए नाबालिग बेटी के कल्याण के लिए उसके हिस्से को बेचने का अधिकार उन्हें है।

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न्यायालय ने आगे कहा कि अधिनियम की धारा 8 (2) कुछ शक्तियों को सीमित करती है, लेकिन संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति में नाबालिग के हित की देखभाल परिवार के वयस्क सदस्य द्वारा ही की जाती है और ऐसी स्थिति में अलग से अभिभावक नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बेटी कक्षा 12वीं की परीक्षा दे चुकी है और आगे उच्च शिक्षा व करियर बनाने के लिए पर्याप्त धन की जरूरत है, जिसके मद्देनजर यह बिक्री उसके हित में है।

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न्यायालय ने मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 17 जुलाई 2025 को पारित आदेश को रद्द करते हुए कहा कि यह कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि नाबालिग हिंदू होने के कारण और संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सेदारी होने के नाते, मां के प्रबंधन में ही उसकी सुरक्षा है।