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12 साल में पहली बार संसद के अंदर हारी मोदी सरकार, अब क्या है आगे का प्लान?

12 साल में पहली बार संसद में मोदी सरकार की बड़ी हार! महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा 131वां संशोधन बिल लोकसभा में गिरा। जानें इस सियासी भूचाल के मायने, विपक्ष का 'नंबर गेम' और 2029 चुनावों के लिए आगे का पूरा प्लान।

Sat, 18 April 2026 07:53 AMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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12 साल में पहली बार संसद के अंदर हारी मोदी सरकार, अब क्या है आगे का प्लान?

भारत के संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल 2026 का दिन बेहद अहम बन गया है। 2014 में सत्ता में आने के बाद से पिछले 12 सालों में यह पहली बार है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) सरकार को लोकसभा के अंदर किसी बिल पर सीधी और बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पास कराने में विफल रही, जिसके बाद उसे परिसीमन से जुड़े दो अन्य अहम बिल भी वापस लेने पड़े।

क्या था 131वां संविधान संशोधन विधेयक?

मोदी सरकार ने 2023 में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण कानून) पास कराया था, लेकिन इसे अगली जनगणना (2027) और परिसीमन के बाद लागू होना था। इस प्रक्रिया में हो रही देरी को देखते हुए सरकार 131वां संशोधन बिल लेकर आई थी। इस बिल के मुख्य उद्देश्य थे:

सीटों में इजाफा: लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करना।

जल्द आरक्षण: 2011 की जनगणना के आधार पर जल्द-से-जल्द नया परिसीमन लागू करना, ताकि 33% महिला आरक्षण को 2029 के आम चुनावों से पहले ही लागू किया जा सके।

नंबर गेम: कैसे हुई सरकार की हार?

संविधान संशोधन बिल होने के कारण इसे पास कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई विशेष बहुमत की आवश्यकता थी।

  • वोटिंग के समय सदन में 528 सांसद मौजूद थे।
  • बिल पास कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी।
  • बिल के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े।विपक्ष (INDIA गठबंधन) एकजुट रहा और विरोध में 230 वोट पड़े।

इस तरह मोदी सरकार को आवश्यक आंकड़े से 54 वोट कम मिले और यह ऐतिहासिक बिल सदन में गिर गया।

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विपक्ष ने क्यों किया विरोध?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों (विशेषकर दक्षिण भारतीय दलों) ने इस बिल का पुरजोर विरोध किया। उनके मुख्य तर्क थे-

दक्षिण भारत को नुकसान: विपक्ष का आरोप था कि 2011 की आबादी के हिसाब से सीटें बढ़ाने पर उन राज्यों (दक्षिण और पूर्वोत्तर) का प्रतिनिधित्व घट जाएगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है।

राजनीतिक नक्शा बदलने की साजिश: विपक्ष ने इसे महिला आरक्षण के नाम पर 'मैथमेटिकल जेरीमैंडरिंग' यानी चुनावी नक्शे से छेड़छाड़ करार दिया, ताकि उत्तर भारत (जहां बीजेपी मजबूत है) में लोकसभा सीटें बढ़ाकर सत्ता पर एकाधिकार किया जा सके।

मूल कानून की मांग: विपक्ष की मांग थी कि महिला आरक्षण को बिना परिसीमन की शर्तों के तुरंत लागू किया जाए।

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अब क्या है आगे का प्लान? सरकार और विपक्ष की रणनीति

इस बड़ी हार के बाद देश की राजनीति का स्वरूप बदलने वाला है।

सरकार का तत्काल कदम (बिल वापसी)

131वां संशोधन बिल गिरने के तुरंत बाद, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इससे जुड़े दो अन्य बिल- परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को भी वापस ले लिया है। सरकार का तर्क है कि ये तीनों बिल एक-दूसरे से जुड़े थे, इसलिए अकेले परिसीमन बिल का कोई औचित्य नहीं है।

2029 में महिला आरक्षण पर सस्पेंस

इस बिल के गिरने का सीधा मतलब है कि अब 2029 के लोकसभा चुनावों में 33% महिला आरक्षण लागू होना लगभग असंभव हो गया है। अब यह आरक्षण अपने पुराने तय शेड्यूल यानी 2026-27 की नई जनगणना के पूरे होने और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू हो पाएगा। यह अधिनियम आधिकारिक तौर पर 16 अप्रैल, 2026 को लागू हुआ, लेकिन 33% आरक्षण कोटा के 2033-2034 तक पूरी तरह से लागू होने की उम्मीद है।

मोदी सरकार के लिए पहली बड़ी हार

यह पहली बार है जब नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाया गया और वोटिंग के लिए रखा गया कोई बिल संसद में गिर गया हो। हालांकि सरकार को पहले कार्यकाल की शुरुआत में भूमि अधिग्रहण कानून और दूसरे कार्यकाल में कृषि कानूनों का विरोध झेलना पड़ा था और कदम पीछे खींचने पड़े थे, लेकिन वे बिल इस तरह वोटिंग में हारे नहीं थे।

अतीत में भी सरकारों को ऐसे झटके लगे हैं

2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) राज्यसभा में गिर गया था हालांकि बाद में इसे संयुक्त सत्र बुलाकर पास करा लिया गया था। 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 64वां संविधान संशोधन (पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए) भी राज्यसभा में गिर गया था। बाद में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में यह 73वें संशोधन के रूप में पास हुआ।

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नया सियासी नैरेटिव और 'ब्लेम गेम'

बीजेपी का प्लान: गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि बीजेपी इस हार को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगी। इसका संकेत तब मिल गया जब बिल गिरने के तुरंत बाद बीजेपी की महिला सांसदों ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया और विपक्ष की कड़ी आलोचना की। सरकार विपक्ष को 'महिला विरोधी' और 'दलित/आदिवासी विरोधी' के रूप में पेश करेगी। सरकार का तर्क है कि परिसीमन से SC/ST सीटें भी बढ़तीं। शाह ने चेतावनी दी है कि विपक्ष को चुनावों में महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।

विपक्ष (INDIA) का प्लान: लोकसभा में मोदी सरकार को उसकी पहली हार चखाकर विपक्ष का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है। विपक्ष इसे संविधान बचाने और संघवाद की जीत के तौर पर पेश कर रहा है। क्षेत्रीय दल यह नैरेटिव सेट करेंगे कि उन्होंने दक्षिण और छोटे राज्यों के अधिकारों को उत्तर भारत के प्रभुत्व से बचा लिया है। यह भी एक बड़ा राजनीतिक सवाल है कि जब सरकार को अच्छी तरह पता था कि उसके पास संविधान संशोधन के लिए पर्याप्त आंकड़े (दो-तिहाई बहुमत) नहीं हैं, तो उसने इस समय यह बिल पेश ही क्यों किया?