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11000 की आबादी वाले देश पहुंचे मोदी सरकार के मंत्री, चीन से है इसकी कट्टर दुश्मनी

विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा के ऐतिहासिक तुवालु दौरे की पूरी खबर। जानें कैसे भारत जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और विकास परियोजनाओं में प्रशांत महासागर के इस द्वीपीय देश का अहम साझेदार बन रहा है और FIPIC का क्या प्रभाव है।

Sat, 25 April 2026 03:20 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, फुनाफुटी
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11000 की आबादी वाले देश पहुंचे मोदी सरकार के मंत्री, चीन से है इसकी कट्टर दुश्मनी

मोदी सरकार के केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा 11,000 की आबादी वाले प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देश तुवालु पहुंचे हैं। यह दौरा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति और प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। तुवालु चीन की ‘एक-चीन’ नीति का कट्टर विरोधी है क्योंकि यह ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना) को मान्यता देता है। ऐसे में भारत की इस यात्रा को क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, पबित्रा मार्गेरिटा 22 से 25 अप्रैल तक चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर वानुअतु और तुवालु गए हैं। 22-23 अप्रैल को उन्होंने वानुअतु का दौरा किया, जहां प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से द्विपक्षीय बैठकें कीं तथा भारत सरकार की मदद से स्थापित ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी’ का निरीक्षण किया। इसके बाद 24 अप्रैल को वे तुवालु की राजधानी फुनाफुटी पहुंचे।

भारत के विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा तुवालु के अपने पहले और ऐतिहासिक दो-दिवसीय आधिकारिक दौरे पर हैं। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और तुवालु के बीच द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करना, विकास परियोजनाओं की समीक्षा करना और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों पर मिलकर काम करना है।

कार्यवाहक प्रधानमंत्री पॉलसन पनापा से व्यापार और विकास पर चर्चा

तुवालु की राजधानी 'फुनाफुटी' पहुंचने के बाद, मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने वहां के कई शीर्ष नेताओं से मुलाकात की और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। मार्गेरिटा ने तुवालु के कार्यवाहक प्रधानमंत्री और विदेश, श्रम व व्यापार मंत्री पॉलसन पनापा से मुलाकात की। इस दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे के निर्माण को लेकर सकारात्मक चर्चा हुई। 'एक्स' पर अपने अनुभव साझा करते हुए मार्गेरिटा ने कहा कि भारत और तुवालु की साझेदारी साझा मूल्यों पर आधारित है और भारत तुवालु की विकास यात्रा में हमेशा एक दृढ़ साथी बना रहेगा।

इस दौरे का कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व

यह दौरा मई 2023 में पापुआ न्यू गिनी के पोर्ट मोरेस्बी में आयोजित 'फोरम फॉर इंडिया पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन' (FIPIC) के तीसरे ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन की निरंतरता का ही एक हिस्सा है। भारत एक्ट ईस्ट नीति के तहत इन देशों के साथ न केवल व्यापार, बल्कि स्वास्थ्य, जलवायु और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

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रणनीतिक रूप से भारत के लिए कितना और क्यों खास है तुवालु?

भौगोलिक आकार और आबादी के लिहाज से तुवालु दुनिया के सबसे छोटे देशों में से एक है। इसकी आबादी मात्र 11,000 के आसपास है, लेकिन भू-राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भारत के लिए इसका महत्व इसके आकार से कहीं बहुत ज्यादा है। प्रशांत महासागर में स्थित होने के कारण यह भारत की 'एक्ट ईस्ट' और 'इंडो-पैसिफिक' नीतियों का एक अहम हिस्सा है।

चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना

प्रशांत महासागर के द्वीपीय देशों (PICs) में चीन तेजी से अपना कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभाव बढ़ा रहा है। हाल ही में सोलोमन आइलैंड्स और किरिबाती जैसे देशों ने ताइवान से रिश्ते तोड़कर चीन से हाथ मिलाया है।

हालांकि, तुवालु दुनिया के उन गिने-चुने 12 देशों में से एक है, जो ताइवान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देता है। चीन का मानना है कि ताइवान उसका अभिन्न अंग है ('वन चाइना पॉलिसी') और जरूरत पड़ने पर वह इसे बलपूर्वक भी मिला सकता है। तुवालु का ताइवान के साथ खड़ा होना सीधे तौर पर बीजिंग की इस नीति को चुनौती देता है। हाल के वर्षों में चीन ने अपनी 'डॉलर कूटनीति' (भारी-भरकम कर्ज और आर्थिक मदद का लालच) के जरिए प्रशांत महासागर के कई छोटे देशों (जैसे- नाउरू, सोलोमन द्वीप और किरिबाती) को ताइवान से रिश्ते तोड़ने पर मजबूर कर दिया है। इसके बावजूद तुवालु झुका नहीं है और ताइवान का समर्थन जारी रखे हुए है, जो चीन की आंखों में खटकता है।

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स्वतंत्र और खुला इंडो-पैसिफिक विजन

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया (क्वाड देश) एक 'स्वतंत्र, खुले और समावेशी' इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की वकालत करते हैं। प्रशांत महासागर के बीचों-बीच स्थित होने के कारण समुद्री सुरक्षा, व्यापार मार्गों की स्वतंत्रता और 'ब्लू इकॉनमी' के लिहाज से तुवालु की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में भारत की छवि

भारत खुद को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और अल्पविकसित देशों) की आवाज के रूप में स्थापित कर रहा है। तुवालु जैसे छोटे द्वीपीय देशों के सामने जलवायु परिवर्तन और समुद्र का जलस्तर बढ़ने का 'अस्तित्व का संकट' है। भारत जब इन देशों को जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचा और आर्थिक मदद देता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक जिम्मेदार और परोपकारी वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की साख मजबूत होती है।

संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन

देश चाहे कितना भी छोटा या बड़ा हो, संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में हर देश का एक वोट होता है। प्रशांत क्षेत्र में 14 स्वतंत्र द्वीपीय देश हैं, जो मिलकर एक मजबूत वोटिंग ब्लॉक बनाते हैं। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सीट के दावे के लिए और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपने प्रस्तावों को पारित कराने के लिए तुवालु जैसे देशों के समर्थन की आवश्यकता होती है।

FIPIC और भारत की कूटनीतिक पहुंच

तुवालु 'फोरम फॉर इंडिया पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन' (FIPIC) का एक सक्रिय सदस्य है। FIPIC की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में की थी। इस फोरम के जरिए भारत एक साथ 14 प्रशांत देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। तुवालु के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत होने से पूरे FIPIC ब्लॉक के साथ भारत की कूटनीतिक पकड़ और मजबूत होती है।