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2050 तक कितनी होगी दुनिया की आबादी, कहां घटेगी और कहां बढ़ेगी? भारत पर क्या अनुमान

India Population Till 2050: रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 तक भारत की आबादी 146 करोड़ थी, जिसके 2050 तक बढ़कर 167.9 करोड़ यानी करीब 168 करोड़ (1.68 अरब) हो जाने का अनुमान है। 

Thu, 23 April 2026 05:21 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली/न्यूयॉर्क
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2050 तक कितनी होगी दुनिया की आबादी, कहां घटेगी और कहां बढ़ेगी? भारत पर क्या अनुमान

Population Till 2050: संयुक्त राष्ट्र के 'वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रोस्पेक्ट्स 2024' के आंकड़ों ने भविष्य की एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। इसके मुताबिक, साल 2050 तक दुनिया की आबादी में करीब 1.4 अरब लोगों की बढ़ोतरी होने का अनुमान है, लेकिन यह इजाफा पूरी दुनिया में एक समान नहीं होगा बल्कि कहीं आबादी बढ़ोत्तरी में भारी उछाल दर्ज किया जाएगा जबकि कुछ देशों में जनसंख्या बढ़ोत्तरी सन्नाटे में तब्दील हो जाएगी और वहां आबादी बढ़ने की बजाय घट जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया के कुछ देश आबादी के बोझ से दबने वाले हैं, वहीं दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अपनी आबादी खोने का डर है। ये बदलाव आने वाले दशकों में श्रम बाजार, आर्थिक विकास और दुनिया भर में असर डालने वाले कारकों को नया रूप देंगे।

अफ्रीका में 'जनसंख्या विस्फोट'

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दशकों में जनसंख्या वृद्धि का मुख्य केंद्र सब-सहारा अफ्रीका होगा। दुनिया के 10 सबसे तेज़ी से बढ़ती आबादी वाले देश इसी क्षेत्र में हैं। कांगो (DRC) इस मामले में सबसे आगे रहने वाला है, जहां 2050 तक सबसे अधिक जनसंख्या वृद्धि देखे जाने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2050 तक कांगो (DRC) की आबादी में 10 करोड़ से अधिक लोगों के जुड़ने का अनुमान है। यह 2025 की तुलना में करीब 93 फीसदी की बढ़ोत्तरी है।

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सब सहारा अप्रीका के अन्य देश जहां तेजी से आबादी बढ़ने का अनुमान है, उनमें नाइजर, अंगोला और सोमालिया जैसे देश शामिल हैं, जहां की आबादी भी अगले 25 वर्षों में लगभग दोगुनी होने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह उच्च प्रजनन दर और बाल मृत्यु दर में आई भारी गिरावट है। आबादी विस्फोट की वजह से इन देशों में बुनियादी ढांचे और रोजगार की चुनौती आ सकती है लेकिन साथ ही आर्थिक विस्तार के नए अवसर भी पैदा करेगी।

सिमटती महाशक्तियां: चीन-जापान पर संकट

एक तरफ जहाँ अफ्रीका में आबादी बढ़ रही है, वहीं दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जनसांख्यिकीय गिरावट (Demographic Collapse) की ओर बढ़ रही हैं। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के लिए 25 साल बाद के आंकड़े डराने वाले हैं। अनुमान है कि 2050 तक चीन की आबादी में 15 करोड़ से ज्यादा की कमी आएगी। चीन की आबादी 2025 में 141.6 करोड़ थी, जो 2050 तक घटकर 126 करोड़ होने का अनुमान है। यह करीब 11 फीसदी की गिरावट है। जापान में भी 2050 तक 14 फीसदी आबादी घटने के आसार हैं। वहां 2025 की आबादी 12.3 करोड़ थी जो 2050 में घटकर 10.5 करोड़ होने का अनुमान है।

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यूरोप और एशिया में क्या बदलाव:

चीन और जापान के साथ-साथ इटली और रूस जैसे देश में भी जनसंख्या में भारी गिरावट का सामना कर रहे हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी खोने वाले शीर्ष 20 देशों में 11 देश अकेले यूरोप के हैं। इनके अलावा पूर्वी एशिया के देशों में भी आबादी में गिरावट शुरू हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, थाईलैंड की आबादी में 42 लाख की कमी आने का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण वहां की गिरती प्रजनन दर (1.2 प्रति महिला) है।

भारत पर क्या प्रभाव?

भारत 2023 में चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत पूरे 21वीं सदी के अंत तक नंबर वन स्थान पर बना रहेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 तक भारत की आबादी 146 करोड़ थी, जिसके 2050 तक बढ़कर 167.9 करोड़ यानी करीब 168 करोड़ (1.68 अरब) हो जाने का अनुमान है। यानी अगले 25 सालों में आबादी में 14.7 फीसदी का इजाफा होने का अनुमान है। माना जा रहा है कि भारत की आबादी 2060 के दशक की शुरुआत में अपने उच्चतम स्तर (लगभग 1.7 अरब) पर पहुँचेगी, जिसके बाद इसमें धीरे-धीरे गिरावट आनी शुरू होगी। हालांकि, इस दौरान 2050 तक जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में कमी आएगी। यानी 2025 में 2.3 करोड़ जन्मे बच्चों से घटकर 2050 में 1.9 करोड़ बच्चों का ही जन्म होगा क्योंकि देश में प्रजनन दर पहले से ही गिरावट के दौर में है।

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वैश्विक अर्थव्यवस्था और सत्ता पर प्रभाव

यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। जनसंख्या में आ रहा यह भारी अंतर पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। इसकी वजह से श्रम बाजार पर बुरा असर पड़ेगा। अमीर और बूढ़े होते देशों (जैसे जापान, चीन, इटली) में काम करने वाले युवाओं की कमी हो जाएगी, जिससे श्रम बाजार पर संकट और दबाब बढ़ जाएगा। जहाँ आबादी कम हो रही है, वहां लेबर की कमी को पूरा करने के लिए युवा आबादी वाले देशों से माइग्रेशन यानी प्रवासन बढ़ सकता है। इसके अलावा सिकुड़ती आबादी का सीधा असर आर्थिक विकास दर (GDP) और सार्वजनिक वित्त पर पड़ेगा, क्योंकि बुजुर्गों की देखभाल का बोझ कम कामगारों पर ही पड़ेगा। यानी मध्य-शताब्दी तक, दुनिया की आबादी दो हिस्सों में बँटी होगी। एक तरफ वे देश होंगे जो अपनी बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के लिए स्कूल और अस्पताल बनाने के लिए संघर्ष करेंगे, और दूसरी तरफ वे देश होंगे जो खाली होते शहरों और कामगारों की कमी से जूझेंगे। यह जनसांख्यिकीय बदलाव आने वाले दशकों में वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक प्रभुत्व को नए सिरे से परिभाषित करेगा।