दुश्मनों सावधान! आ रही 'सुदर्शन चक्र' की नई खेप; जानिए- कैसे पहुंचाया जाता है एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम
रूस से भारत को एस-400 स्क्वॉड्रन एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की चौथी खेप जल्द ही मिलने वाली है। इसके साथ ही भारत के एयर डिफेंस सिस्टम को और ज्यादा मजबूती मिलेगी। यह ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हो चुका है और इसका नामकरण सुदर्शन चक्र किया गया है।

रूस से भारत को एस-400 स्क्वॉड्रन एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की चौथी खेप जल्द ही मिलने वाली है। इसके साथ ही भारत के एयर डिफेंस सिस्टम को और ज्यादा मजबूती मिलेगी। यह ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हो चुका है और इसका नामकरण सुदर्शन चक्र किया गया है। लेकिन रूस से यह सारा सिस्टम भारत तक पहुंचेगा कैसे? असल में यह सब बहुत ही योजनाबद्ध ढंग से होता है। इसके लिए समुद्री रास्ते के साथ-साथ भारी वजन ढोने में सक्षम मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का भी इस्तेमाल होता है। यह सारी प्रक्रिया बेहद समन्वित ढंग से अंजाम दी जाती है। इतना ही नहीं, ट्रांसपोर्ट किए जाने से पहले, इसे भारतीय वायु सेना के अधिकारियों द्वारा कड़े निरीक्षण के बाद, विशेष कंटेनरों में पैक किया जाता है। यह कंटेनर ऐसे होते हैं, जिनमें इन सामानों के टूटने का डर नहीं रहता है। साथ ही जानिए इसकी खासियत...
भारत तक कैसे पहुंचेगा
एस-400 का पूरा सिस्टम भारत तक लाने में बड़े पैमाने पर तैयारी चाहिए होती है। इसके लिए पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं। आइए जानते हैं कैसे पूरे होते हैं यह चरण...
समुद्री ट्रांसपोर्ट
इसके लिए बहुत भारी मशीनरी इस्तेमाल होती है। विशाल मिसाइल ट्रांसपोर्टर-एरेक्टर-लॉन्चर और तकनीकी सपोर्ट व्हील से एस-400 को रूस में सुरक्षित कार्गो जहाजों पर लादा जाता है। ये भारी शिपमेंट विशिष्ट भारतीय समुद्री बंदरगाहों पर पहुंचते हैं।
भारी मिलिट्री एयरक्राफ्ट
इसके बाद बेहद सुरक्षित ढंग से इंटरसेप्टर मिसाइलों के शुरुआती बैच एरियल रूट द्वारा ले जाए जाते हैं। इन्हें सीधे सुरक्षित भारतीय वायु सेना के बेस तक ले जाया जाता है। इसके लिए भारी परिवहन विमान जैसे कि इल्यूशिन Il-76 और बोइंग C-17 ग्लोबमास्टर III का इस्तेमाल होता है।
कैसे तैयार होता है एस-400
एक एस-400 स्क्वॉड्रन सिर्फ एक मिसाइल लांचर नहीं है। यह एक हाइली इंटीग्रेटेड, मोबाइल कॉम्पैक्ट सिस्टम है। हर स्क्वॉड्रन में आमतौर पर 16 तक स्पेशलाइज्ड व्हीकल होते हैं। इनमें लॉन्ग-रेंज सर्विलांस राडार (600 किमी), कमांड और कंट्रोल वाहन (55के6ई, मल्टीफंक्शन राडार), 8 गुणा मोबाइल लांचर यूनिट्स, टेक्निकल सपोर्ट और रीसप्लाई व्हीकल्स होते हैं।
कॉम्बैट और कंट्रोल सेंटर
इसका सेंट्रल हब, जैसे 55के6ई व्हीकल, ट्रैकिंग डेटा को प्रोसेस करता है। यह पूरे युद्धक्षेत्र के रिस्पांस को को-ऑर्डिनेट करता है।
लंबी दूरी की निगरानी का राडार
इसमें एक पैनोरमिक राडार ट्रैकिंग सिस्टम लगा हुआ है। यह एक समय में करीब 300 लक्ष्यों का पता लगाने में सक्षम है। यह 600 किमी तक की दूरी पर काम कर सकता है।
मल्टीफंक्शन एंगेजमेंट राडार
यह लक्ष्य को सटीक ढंग से भेजने में अहम भूमिका निभाता है। इल्युमिनेशन राडार खास खतरों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और इंटरसेप्टर मिसाइलों को रास्ता दिखाते हैं।
मोबाइल लॉन्चर यूनिट्स
आमतौर पर हर स्क्वॉड्रन में आठ लॉन्चर होते हैं। हर लॉन्चर वाहन में चार मिसाइल कैनिस्टर होते हैं। इनमें छोटे, मध्यम और लंबी दूरी की इंटरसेप्टर मिसाइलों का मिक्स होता है। यह 400 किमी तक की दूरी तक के लक्ष्यों को मार गिराने में सक्षम होतीहैं।
सपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर
संबंधित मिसाइल ट्रांसपोर्ट-रीलोडर वाहन, मोबाइल जनरेटर और टेक्निकल मेंटेनेंस यूनिट भी शामिल होती है।
कब हुआ था अनुबंध
भारत ने रूस के साथ साल 2018 में पांच एस-400 स्क्वॉड्रन के लिए अनुबंध किया था। यह अनुबंध, 5.43 बिलियन डॉलर का था। इसी अनुबंध की चौथी यूनिट अब आने वाली है। इस यूनिट को राजस्थान में तैनात किया जाएगा। इसका मकसद, भारत की पश्चिमी सीमा के साथ लंबी दूरी की मिसाइल और ड्रोन रक्षा को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत करना है। बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 की खासियतों को खूब परखा गया है। आसमानी सुरक्षा को इसने जबर्दस्त ढंग से मजबूती दी थी। पांचवां और अंतिम स्क्वॉड्रन नवंबर तक आने वालाहै।




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