India plans to reduce size of exclusion zones around nuclear plants to free up land परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के बफर जोन को घटाने का फैसला, आखिर सरकार ने क्यों उठाया यह कदम, India News in Hindi - Hindustan
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परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के बफर जोन को घटाने का फैसला, आखिर सरकार ने क्यों उठाया यह कदम

सरकार का तर्क है कि आधुनिक और सुरक्षित रिएक्टर टेक्नोलॉजी के कारण बफर जोन घटाया जा रहा है। यह अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के वैश्विक मानकों के तहत है, जहां निश्चित दूरी तय नहीं की जाती। 

Mon, 11 May 2026 06:44 PMNiteesh Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के बफर जोन को घटाने का फैसला, आखिर सरकार ने क्यों उठाया यह कदम

भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आसपास के बफर जोन को घटाने का फैसला किया है। अब छोटे रिएक्टर्स के लिए यह दूरी 500 मीटर और बड़े रिएक्टर्स के लिए 700 मीटर रखी जाएगी। फिलहाल सभी परमाणु रिएक्टर्स के चारों ओर कम से कम 1 किलोमीटर का बफर जोन है, जहां कोई आवास या आर्थिक गतिविधि नहीं हो सकती। यह बदलाव भूमि की कमी को दूर करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

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अधिकारियों के अनुसार, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड और परमाणु ऊर्जा विभाग ने इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से मंजूरी दे दी है। यह बदलाव अगले कुछ महीनों में जारी होने वाले अंतिम नियमों में शामिल किए जाएंगे। भारत का लक्ष्य 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को मौजूदा 8 गीगावॉट से बढ़ाकर 100 गीगावॉट करना है। पिछले साल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी और विदेशी कंपनियों के लिए खोलने के बाद यह कदम उठाया गया है।

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आखिर क्यों लेना पड़ा यह फैसला

नए नियमों से बड़े रिएक्टर्स के लिए भूमि की जरूरत आधी और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर्स के लिए दो-तिहाई कम हो जाएगी। इससे एक ही जगह पर दो से तीन गुना ज्यादा क्षमता स्थापित की जा सकेगी। उदाहरण के लिए, 10 रिएक्टर्स (प्रत्येक 700 मेगावॉट) वाला कॉम्प्लेक्स 700 हेक्टेयर से कम भूमि में बन सकता है, जबकि मौजूदा प्लांट्स को आमतौर पर 1000 हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है। इससे मौजूदा प्लांट्स में नए रिएक्टर्स जोड़ना आसान होगा और औद्योगिक क्षेत्रों में कैप्टिव उपयोग के लिए छोटे रिएक्टर्स लगाए जा सकेंगे।

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सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानक भी अहम

सरकार का तर्क है कि आधुनिक और सुरक्षित रिएक्टर टेक्नोलॉजी के कारण बफर जोन घटाया जा रहा है। यह अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के वैश्विक मानकों के तहत है, जहां निश्चित दूरी तय नहीं की जाती। भारतीय प्लांट्स के आसपास विकिरण स्तर प्राकृतिक पृष्ठभूमि से काफी कम पाए गए हैं। राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान के इंजीनियरिंग डीन आर. श्रीकांत ने कहा कि यह बदलाव 18 महीने से चर्चा में था और पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि, भूमि अधिग्रहण में लगने वाला 4-5 साल का समय और सख्त साइटिंग नियम नए प्लांट्स स्थापित करने में बड़ी बाधा बने हुए हैं।