तीन सीट और एक बड़ा संकेत; कैसे ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य के लिए भी बढ़ी टेंशन
विधानसभा की 207 सीटें जीतकर भाजपा ने सत्ता हासिल की है तो अब ये चर्चाएं हो रही हैं कि आखिर क्या चीजें ममता बनर्जी के खिलाफ चली गईं। इनमें से एक मुस्लिम कार्ड भी माना जा रहा है। दरअसल टीएमसी लगातार मुस्लिमों को लुभाने के लिए प्रयास करती रही है, जबकि भाजपा ने हिंदुओं के ध्रुवीकरण का प्रयास किया।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ममता बनर्जी को गहरा झटका दिया है। 2011 में जब वह पहली बार सीएम बनीं तब से अब तक उनका शासन निर्बाध चलता रहा। अब उस पर भाजपा ने बड़ा ब्रेक लगा दिया है। विधानसभा की 207 सीटें जीतकर भाजपा ने सत्ता हासिल की है तो अब ये चर्चाएं हो रही हैं कि आखिर क्या चीजें ममता बनर्जी के खिलाफ चली गईं। इनमें से एक मुस्लिम कार्ड भी माना जा रहा है। दरअसल टीएमसी लगातार मुस्लिमों को लुभाने के लिए प्रयास करती रही है, जबकि भाजपा ने उसके काउंटर में हिंदुओं के ध्रुवीकरण का प्रयास किया।
चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भाजपा शायद हिंदू ध्रुवीकरण में सफल रही और टीएमसी को मुस्लिमों का अपेक्षानुसार समर्थन नहीं मिला। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा रहा है कि 2021 में खाता भी ना खोल पाने वाली कांग्रेस के दो कैंडिडेट जीते हैं। दोनों ही मुस्लिम हैं। इसके अलावा सीपीएम के मुस्तफिजुर रहमान को जीत हासिल हुई है और वह डोमकाल सीट से विधायक चुने गए हैं। इस तरह वामदलों और कांग्रेस की विधानसभा में वापसी हुई है और तीनों ही मेंबर मुसलमान हैं। इससे स्पष्ट है कि शायद दोनों दलों को मुस्लिमों के एक हिस्से का समर्थन हासिल हुआ है। वहीं ममता बनर्जी से अलग होकर नया दल बनाने वाले हुमायूं कबीर खुद दो सीट से जीत गए।
वह नोवदा और रेजीनगर सीट से खुद जीते हैं। उन्होंने बाबरी के नाम से मस्जिद बनाने का ऐलान किया था और बीते कई महीनों से ममता बनर्जी के तीखे आलोचक बने हुए थे। यही नहीं टीएमसी की हार के बाद उन्होंने ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक पर भी निशाना साधा। इन नतीजों से स्पष्ट है कि मुस्लिमों का एक वर्ग टीएमसी से तमाम कोशिशों के बाद भी छिटक गया है। यह स्थिति ममता बनर्जी और टीएमसी की राजनीति के लिए भविष्य में भी खराब संकेत लेकर आई है। ममता बनर्जी की चुनावी सफलता में एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम वोट बैंक का रहा है। अब यदि वह छिटक गया है तो उसकी भरपाई कैसे की जाए। इसके लिए ममता दीदी को मंथन करना होगा।
सड़क की जंग लड़ेंगी या उपचुनाव से सदन जाएंगी ममता बनर्जी?
फिलहाल 80 सीटों के साथ एक मजबूत विपक्ष की भूमिका में दीदी होंगी। लेकिन मुश्किल यह है कि वह खुद अपनी भी सीट हारकर विधानसभा से बाहर हैं। ऐसे में वह असेंबली जाने के लिए फिर से उपचुनाव का रास्ता अपनाएंगी या सदन में किसी और नेता को कमान देकर खुद सड़क की राजनीति करेंगी। यह देखना होगा। ममता बनर्जी वैसे सड़क की राजनीति से होकर ही सदन तक पहुंची थीं। ऐसे में उन्हें फिर से करेक्शन करना होगा। टीएमसी के नाम के अनुरूप ही फिर से तिनका-तिनका जोड़कर पार्टी को मजबूत करना होगा।




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